समाज की अँधेरी राहों को अपनी किरणों से रोशन करती , डॉ मरियम मेहर

समाज की अँधेरी राहों को अपनी किरणों से रोशन करती , डॉ मरियम मेहर

हमारे जिद्दी दोस्तों !
हम लौट आयें ज़िद से जन्मी एक और दास्तां लेकर जो आप में  जोश और  जुनून का संचार तो करेगी ही अपितु  आपमें   स्वदेश के लिए कुछ करने की भावना भी जागृत कर देगी | हमारे देशकेमिसाइल मैनडॉ एपीजे अब्दुल कलाम एक अत्यंत प्प्रेरणादायी वाक्य कहा करते थे,   

अगर तुम सूरज की तरह चमकना चाहते हो तो पहले सूरज की तरह जलना सीखो| “ 

और इस वाक्य का जीताजगता उदाहरण है, डॉ मरियम मेहर, जिनकी दास्तां हम आज आपको सुनाने वाले हैं |’मेहर’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘सूर्य ‘ तो आप कह सकते है , इनके नाम में ही सूर्य का वास है|  ये  ना केवल आज सूर्य की तरह अपने समाज की हर अँधेरी राह को अपनी क़ाबिलियत के  प्रकाश से रोशन कर रहीं हैं लेकिन समाज को रोशन करने के लिए वो लगातार दीपक की लौ की तरह प्रयासरत होकर जल भी रही है।

मरियम जी ने जीवन मे आई हर चुनौती  का जवाब अपनी मेहनत और लगन से दिया हैइन्होंने अपने जीवन मे अपनी  मेहनत,ज़िद और आत्मविश्वास  को ही अपनी सफलता की कुंजी बनाया हैअपने लिए तो सभी जीते है किंतु इनके लिए सफलता के मायने खुद के स्वार्थ से बढ़कर, अपने समाज की उन्नति मे हैं | इसीलिए ख़ुदा ने भी हर कदम पर इनका हाथ थामे रखा

तो आइये हमारे साथ राजस्थान के जोधपुर जिले के छोटे से गाँव की गलियों से शुरू हुए एक सफ़र परसामना करेंगे उन  चुनौतियों का जिन पर विजय पाकर डॉ मरियम आज अपने देश के लिए कुछ करने के काबिल बनी।

बचपन - मेहनत की देहलीज़

मेरा जन्म बाड़मेर के पास स्थित एक छोटे से गाँव , अजीत नगर के एक आम किसान परिवार मे हुआ | सात साल की उम्र तक अपने दो भाइयों के साथ वहीं खेल कूद मे मशरूफ रही | एक बड़े संयुक्त परिवार से होने के कारण अपने बड़ों का आदर करने की भावना बचपन से ही गयी थी |  

मेरे पिता अपने परिवार के पहले पढ़े लिखे व्यक्ति हैं | अपनी मेहनत से वे जोधपुर न्यायलय में  अधिवक्ता बने | मेरे पिता ही मेरे जीवन का वो आधार है जिनसे  मेरी कहानी प्रारम्भ हुयी  है| पिता जी हमेशा से हम सबको पढ़ना लिखना चाहते थे तो जब मैं 7 साल की थी तब वे हमें जोधपुर ले आए

गाँव में सारा दिन खेल कूद में मशगूल रहने वाली मेरे जैसी  लड़की के लिए शहर का स्कूल वाला जीवन किसी कैद से कम ना था | पढाई में मेरा कभी मन ना लगताएक बार पिताजी मुझे पढ़ाने की कोशिश कर रहे थे और मैं अपनी खेलने की ज़िद लेकर  बैठी थी| पिताजी ने पहली बार अपनी आवाज़ ऊँची की , और उनके शब्द आज भी मेरे कानों में  गूंजते हैं |

एक वो दिन था और आज का दिन , किताबों से मेरी ऐसे पक्की वाली दोस्ती हो चली थी और  आज भी हमारा रिश्ता बहुत गहरा है| उस दिन के बाद मैंने ठान लिया की मुझे मेरे पिता का सिर  गर्व से ऊँचा करना है

मेरे पिता हमेशा मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया करतेमैं सिन्धी मेहर समाज से हूँ जहाँ शिक्षा ने अब जाकर कहीं  दस्तक देना शुरू किया है परन्तु मेरे पिता ने आज से 20 साल पहले हमें पढाया लिखाया | वह मेरे भाइयों से भी ज्यादा, मुझे पढने के लिए प्रेरित करते क्योंकि वह चाहते थे की मैं पढ़ लिख कर कुछ ऐसा करूँ के एक मिसाल बन जाऊँ और मुझे  देखकर हमारे समाज की बेटियां भी आगे बढ़ सकें

मैंने भी अपनी और से कोई कमी नहीं रहने दी | इसी के फल स्वरूप मैंने 8 वीं कक्षा में मेरिट में स्थान प्राप्त कियामुझे आज भी वो दिन याद है जब पिताजी अखबार लेकर मेरे क्रमांक से मेरा परिणाम खोज रहे थे और आधे घंटे की मशक्कत के बाद उन्होंने पाया के मेरा नाम उस सूचि में ना होकरमेरिट लिस्टमें हैं | उनकीचमकती  आँखों की  ख़ुशी ने    मुझे और आगे बढ़ने की ऊर्जा हस्तानांतरित कर  दी थी

पढ़ाई  के साथसाथ उन्होंने सदैव हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी सिखाया | मुझे आज तक कोई ईद याद नहीं जो हमने अपने पुरे परिवार के बिना मनाई होहर त्यौहार  , हर ख़ुशी और हर गम में हमारा पूरा परिवार साथ ही होताहै | मेरे चचेरे भाई भी पढ़ाई के लिए गाँव छोड़कर बहुतसमय तक हमारे साथ रहें | मेरे पिताजी हम सभी को उन्नति की राह पर अग्रसर  देखना चाहते थे

इसी तरह आधुनिकता के  युग  में भी हमने कभी अपनी संस्कृति अपनी परम्पराओं से नाता नहीं तोड़ा| मेरे पिताजी के साथ रहते रहते धीरे धीरे मैं अपने समाज की दिक्कतें महसूस करने लगी और मेरे पिता जी की सोच कब मेरे सपनों में बदल गयी पता ही नहीं लगा |  

वीं की ही तरह 10 वीं में भी मैंने अच्छे परिणाम हासिल किये और एक उज्जवल भविष्य की ओर कदम बढ़ाएं | अब मौका आया, अपने जीवन के सबसे बढ़े निर्णयों में से एक लेने का कक्षा 11 वीं के लिए विषय चुनने का | मेरे पिताजी का सपना था की मैं एक डॉक्टर बनूं और मेरी रूचि भी मेडिकल की ओर थी तो मैंने बायोलॉजी  को चुना |

डॉक्टर बनने के लिए आपको सबसे पहले प्री मेडिकल टेस्ट देना होता है, जिसकी तैयारी के लिए  लाखों बच्चे  कोटा की ओर अपना रुख मोड़ लेते  हैं | मेरे पिता भी चाहते थे के वे मुझे कोटा भेजें, लेकिन उस वक़्त मुझे एक नए शहर में भेजना उन्होंने शायद मुनासिफ नहीं समझा |

जोधपुर मैं वो जो अच्छी से अच्छी सुविधायें मुझे दे सकते थे उन्होंने दी| मैंने 12 वीं भी बहुत अच्छे परिणाम के साथ पास की| उसके बाद मैंने एक साल प्रीमेडिकल एग्जाम के लिए जी तोड़ मेहनत की | मेरी  मेहनत एक बार फिर सफल हुई और मैंने एक बहुतबड़ी चुनौती पर जीत पाई

ये रास्ता इतना आसान  नहीं था, पर मेरा प्रेरणास्त्रोत भी कुछ कम नहीं था | इसके बाद अब मौका था मेरे लिए कॉलेज चुनने का, मेरे पिता ने हमेशा  चाहा की मैं अपने लोगों के बीच रहकर उनके लिए काम कर सकूँ  | मेरे लिए एक ऐसा कॉलेज और करियर चुनना ज़रूरी था जिससे निकल कर मै  अपने समाज के लिए कुछ कर सकूँ

इन्हीं  सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैंनेडेंटल फील्डको अपना करियर चुना क्योंकि एक डेंटल डॉक्टर के पास अपने काम के अलावा अपनी सामाजिक एवं नैतिक जिम्मेदारियों को पूरा करने का समय होता है वहीँ एक एम.बी.बी.एस डॉक्टर को अपने काम में ही अत्यंत व्यस्त रहना पड़ता है| इसलिए मेरा दाख़िला हुआ जोधपुर में स्थितव्यास डेंटल कॉलेज में ‘ 

कॉलेज - एक नया जहाँ

हर व्यक्ति के लिए उसका कॉलेज का सफ़र कुछ ख़ास ही होता हैं , अब  आप  स्कूल जितने छोटे नहीं रहे और ना आप इतने बड़े हुए हैं कि  आपके कन्धों पर परिवार की जिम्मेदारियाँ  जाएँ | कॉलेज की ज़िंदगी एक बहुत ख़ूबसूरत सफ़र है , जो आपको अपने आप को पहचानने का मौका देता हैं

पर ये तो हुई वो बातें जो कॉलेज छोड़ने के 7 साल बाद में बोल रही हूँ लेकिन कॉलेज में दाख़िला लेते वक़्त आपके दिमाग में ये सब  नहीं चल रहा होता | आप अपने जीवन के एक नए पड़ाव की ओर बढ़  रहे होते हैं और आपके अंदर एक  नई सी ऊर्जा का संचार हो रहा होता हैं

मेरे कॉलेज की शुरुआत भी कुछ इसी तरह हुई | हमारे कॉलेज में देश के अलगअलग कोनों  से आए हुए लोग थे जिनकी अपनी बोली, अपने विश्वास और एक अलग काम करने का तरीका था| कोई आसाम से था तो कोई गुजरात से, कश्मीर से था तो कोई कन्याकुमारी से| इतनी विविधता भरी कक्षा में पढ़ते पढ़ते मैंने मानो भारत की अनगिनत संस्कृतियों का स्वाद चख लिया था |

कॉलेज के दौरान मेरे विषयों के साथ साथ  मैंने जीवन के भी  कई पाठ पढ़े | हमारे प्राध्यापक हमें अपने विषय तो पढ़ाते ही थे लेकिन इनके साथसाथ हमें जीवन के कुछ ऐसे पाठ भी सीखा जाते जो हमारे साथ ज़िंदगी भर रहने वाले थे|     

मेडिकल कोर्सेज आर्थिक तौर पर काफ़ी महंगे होते हैं | एक माध्यम वर्गीय परिवार के लिए इतने पैसे जुटा पाना बहुतमुश्किल होता है , लेकिन मेरे माँबाउजी  के चेहरे पर मुझे कभी एक शिकन नज़र नहीं आयी  | उन्होंने कभी मुझे ये महसूस ही नहीं होने दिया की हमारे परिवार के लिए यह कितना मुश्किल समय था |  

इसी दौरान जब मेरे स्नातक के 3 साल से मैंने जब अपनी प्रैक्टिस शुरू की तो मुझे रोगियों के साथ बात करना उन्हें आरामदायक  करना भी धीरे धीरे आने लगा | इस से मेरी रूचि समाज की सेवा की ओर और बढ़ी , क्योंकि एक डॉक्टर होने के नाते मुझे उनसे बात करने उनकी तकलीफों को सुनने का मौका मिलता जो मुझे उन तकलीफों को दूर करने के लिए और मेहनत करने की प्रेरणा देता

कॉलेज के दौरान भी मैंने पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी| मैं उतनी ही लगन के साथ पढ़ती और फल स्वरूप मैंने मेरी 5 वर्ष की डिग्री को 5 वर्षों में ही ख़त्मकिया और बन गयी मरियम मेहर से डॉमरियम मेहर

मेरे परिवार, मेरे रिश्तेदारों और मेरे समाज के लिए यह एक बहुतबड़ा मौका था , क्योंकि मैं मेहर समुदाय  से पहली डॉक्टर बनीं  | मेरे  माँपिताजी की आँखों में सजे ख़्वाब को कुछ हद तक मैंने उस दिन पूरा कर लिया था

पर जीवन में संघर्ष  के साथ मेरा रिश्ता अभी लंबा चलने वाला था ….

शिक्षा का सफ़र एक शिक्षक के नज़रिए से

मैं अपने बैच के कुछ टॉप छात्रों में से एक थीजब मैंने अपनाइंटर्न पीरियडपूरा किया तो मुझे मेरे ही कॉलेज में एकजूनियर लेक्चररकी पोस्ट  ऑफर हुई | मेरे लिए अपना खुद का क्लीनिक अभी खोल पाना मुश्किल था और किसी भी प्राइवेट क्लीनिक में काम करने से मुझे बच्चों को पढ़ना एक बहुत बेहतर विकल्प लगा

एक छात्र की तौर पर  मैंने शिक्षा का ये सफ़र जीया था लेकिन एक शिक्षक के नज़रिए से यह सफ़र कैसा नज़र आता है, वो मुझे अब पता चला था| यकीन कीजिये इन दोनों नज़रियों में ज़मीन आसमान का फर्क है| जहाँ एक छात्र बस कैसे भी पढ़ाई से दूर भागने की कोशिश करता वहाँ एक शिक्षक उसी शिक्षा इतना रोचक बनाने की कोशिश में जुटा रहता है किछात्रोंकोकैसेइसमेंरुझानपैदाकियाजाये?

मैं सौभाग्यशाली थी की मेरे आस पास इतने अनुभवी प्राध्यापक मौजूद थे कि मुझे ये सीखने में बहुतज्यादा समय नहीं लगा| लेकिन दूसरी और मेरे छात्रों  को मुझे एक अध्यापक के रूप में अपनाने में थोड़ा  समय लगा क्योंकि मैं पिछले 5 साल वहां एक छात्र के तौर पर पढ़ रही थी और अब मैं जिन्हें पढ़ा रही थी वे सब मेरे ही जूनियर्स थे

रोज़ाना लेक्चरस लेनाप्रैक्टिकल क्लासेज लेना  और फिर हॉस्पिटल में अपनी प्रैक्टिस जारी रखना यही मेरी दिनचर्या बन चुका था | मैंने इस दौरान अपने आप को बहुत निखारा | मैं  अपने कॉलेज के दिनों में बहुतज्यादा नहीं बोला करती थी लेकिन अब एक साथ 60 लोगों को संबोधित करना सीख गयी थी| शुरुआत में मुझे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता मगरमुश्किलों के बादलभी मेहनत के सूरज के आगे, घुटने टेक ही देते हैं |

एक प्राध्यापक के तौर पर मेरी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से हटकर कुछ दिन होते जिनका मैं बेसब्री से इंतज़ार करती | वो थे कम्युनिटी हेल्थ कैम्प, मुझे हॉस्पिटल और   क्लीनिक में  काम करने से फील्ड पर काम करना बहुतबेहतर लगता है| हॉस्पिटल और क्लीनिक तक सिर्फ वो ही लोग पहुँच पातें हैं जो काफी जागरूक है और समृद्ध भी हैं लेकिन जब आप चिकित्सा को मरीज़ों के पास ले जाते हैं तब आप को आम लोगों के जीवन में रहीं तकलीफों का अंदाज़ा लगता हैं|

इन डेंटल हेल्थ कैंपों में मरीज़ों से बातचीत करते उनकी पीडाओं का निवारण करते मैं कहीं कहीं अपने पिता जी का सपना जी रही थी| वो हमेशा से मुझे अपने समाज अपनी सर ज़मीन के लिए कुछ करते देखना चाहते थे और इन कैंपों की  वजह से मैं फील्ड पर जाकर अपने आस पास के जरूरतमंद लोगोंकी सहायता  कर पाती

मैंने मेरे कॉलेज से कहकर कई बार मदरसों में भी ये कैंप करवाए क्योंकि मदरसों पर ज़्यादातर कॉलेज या संस्थाएं ध्यान देना भूल जाती हैं| मदरसों में छोटे छोटे बच्चों कोओरल हाइजीन ’ , ‘डेंटल हेल्थके पाठ पढ़ाना मुझे बहुत पसंद था और आज भी बच्चों के साथ होती हूँ तो मैं खुद को बहुत खुश पाती हूँ

मुझे हर कैंप मेरी ज़मीन और मेरे समाज के और क़रीब लाता क्योंकि मुझे दांतों की तकलीफों के साथ ही उनकी अन्य परेशानियों को देखने का मौका मिला, जिसने मुझे प्रेरित किया की मैं इनके लिए एक बेहतर कल के निर्माण में कुछ योगदान करूँ

ऐसे ही छात्रों को सिखाते , और दुनिया से सीखते हुए  मैंने इस एक प्राध्यापिका के तौर पर पाँच साल पूरे किये |  

मैंने जाना कीहमारे समाज में  कितने ही  लोग कितनी सारी विभिन्न समस्याओं के साथ अपना जीवन जी रहें है लेकिन अगर हमारे जैसे पढ़े लिखे लोग उनकी इन तकलीफों में छोटी छोटी  मदद भी करें तो उनके जीवन में मूलभूत बदलाव जायेंगे |”

सुश्री मरियम मेहर से श्रीमती मेहर तक का सफ़र

 मेरे पिताजी ने हमेशा हमें कहा , “बेटा , किसी सपनों के राजकुमार का इंतज़ार मत करो  |  अपने ज़िंदगी के हीरो तुम खुद हो अपने पैरों पर खड़े होना सीखो  और इतने काबिल बनो के ज़िंदगी  में किसी भी काम के लिए तुम्हें किसी और पर निर्भर ना  रहना पड़े  | ”
यूँ तो हमारे समुदाय में बेटियों की शादी बहुतछोटी  उम्र में ही तय कर दी जाती है लेकिन मेरे पिता ने मुझे अपने पैरों पर खड़े होने का मौका दिया | उन्होंने मुझे एक अच्छी डिग्री के रूप में एक ऐसा तोहफ़ा दिया जिस पर मुझे अपनी जीवनकी कहानी लिखने का मौक़ा मिला।

पर अब जब मैं अपने पैरों पर खड़ी भी हो चुकी थी तो मेरे पिता जी ने सही समय पर मुझे एक नए रिश्ते की जिम्मेदारियाँ सौपने का निर्णय लिया | एक बेटी के लिए शादी करके एक नए परिवार को अपनाना बहुतआसान नहीं होता

2018 में मेरी शादी पोखरण के एक संयुक्त परिवार में हुई | मेरे पति , मेरे पिता की ही तरह एक अधिवक्ता हैं और वे  पोखरण से 110 कि.मी. दूर जैसलमेर में अपनी लॉ की प्रैक्टिस करते हैं| उनकी सोच भी अपने सामाजिक उत्थान की और सहयोग से भरपूर रही है ।इसलिए आज हम साथ मिलकर कुछ नन्हे कदम हमारे समाज और हमारी सर ज़मीन की उन्नति की ओर बढ़ा   रहे है |

मुझे ससुराल में भी एक भरा पूरा परिवार मिला , नन्हेनन्हे  बच्चों की अटखेलियों  से लेकर, बड़े बुज़र्गों के आशीर्वाद तक हमारे परिवार में कोई कमी नहीं है  | मेरे पिता जीमाता जी  की दी हुई परवरिश ने मुझे  हौंसला दिया और मुझे इस परिवार को अपनाने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई |

शहर आने के बावजूदभी  हमारे गाँवकी मिट्टी से भी मेरा जुड़ाव बना रहा क्योंकि पिताजी ने हमें हमेशा अपनी जड़ों से बंधे रहना सिखाया | जोधपुर से पोखरण आने के बाद भी गाँवों की मिट्टी से मेरा लगाव कभी कम ही नहीं हुआ

यह हमारे देश की एक बहुत बड़ी विडम्बना है के हमारे जवान लोग बेहतर जीवन की तलाश में अपनी मिट्टी , अपनी जड़ों को पीछे छोड़ आगे तो बढ़ जातें है लेकिन वो भूल जातें हैं की इस मिट्टी का उन पर कितना क़र्ज़ है जो उन्हें अभी चुकाना बाकि है| अपने समाज , अपनी मातृभूमि को लेकर वो अपने फ़र्ज़ भूल जाते हैं|   

जब मैंने पोखरण में रहना शुरू किया तो पाया की मेरे समुदाय के ज्यादातर लोग पोखरण और  उसके आस पास के गाँवों में ही रहते है| तब मुझे महसूस हुआ की जैसा पिता जी चाहते थे, आज मै अपने समाज के लोगों के बीच थी और उनके लिए कुछ करने का मेरे पास सर्वश्रेष्ठ अवसर मेरे सामने था

लेकिन दूसरी और अब मेरे सामने तीन रास्ते थे , पहला पोखरण में ही रहकर, अपना क्लीनिक शुरू करना क्योंकि पोखरण में इससे पहले कोई  बहुतअच्छा डेंटल हॉस्पिटल नहीं था| दूसरा जैसलमेर में अपने पति के साथ रहकर किसी क्लीनिक में प्रैक्टिस करना या फिर तीसरा विकल्प था दोबारा जोधपुर जा कर प्रैक्टिस करना|

मेरा एक साल इन्हीं तीनों विकल्पों को नापने  – तोलने में निकला| इस दौरान मैंने मेरे परिवार के बच्चों को पढ़ाना  शुरू किया | मेरे नए परिवार ने इसे बहुतसराहा| हर कोई चाहता है की उनका बच्चा पढ़ लिख कर अपने जीवन को सफल बनाए पर उनके आगे बहुत सी  चुनौतियाँ खड़ी होती हैं| आर्थिक मुश्किलें, अच्छी शिक्षा की कमी और कई सारे रोड़े जो इस राह को मुश्किल बनादेते  है

मैं बच्चों के बीच अपना बचपन जीती  क्योंकि सीखने की वही भूख उनमें  भी मुझे नज़र आती | धीरे धीरे परिवार के साथ साथ मैंने आस पड़ोस के बच्चों को भी पढ़ाना शुरू किया| हमारे यहाँ पढ़ाई लिखाई  के साथ, धार्मिक  ज्ञान होना भी ज़रूरी है | तो कई बार मुझसे हमारे यहाँ के लोग पूछा करतेआपने कुरान या कोई पाक किताब पढ़ी  है ? ” और मेरा जवाब हर बार हाँ ही होता| इसे सभी लोग आश्चर्य चकित हो जाते के डॉक्टर होने के साथ साथ धार्मिक ज्ञान भी और गाँव में रहने के संस्कार भी

जब भी में किसी की तारीफ सुनती मुझे अपने पिता पर और गर्व होता की उन्होंने हमें हर तरह से सक्षम बनाया , इतनी काबिलियत दी की जीवन में चाहे कोई भी परिस्थिति आए हम उसमे खुद को सँभाल सकें| मै  हर मातापिता को ये कहना चाहूँगी के अपने बच्चों को उनके सपनों की उड़ान भरने दीजिये लेकिन उन्हें अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी सिखाईये ताकि जीवन की किसी भी परिस्थिति में वे किसी का मुँह  ताकने को मजबूर हों |  

अब मैं  एक गृहिणी की तरह अपना घर भी संभल रही थी और साथ ही बच्चों को पढ़ा भी रही थी, लेकिन मैं ये भूल नहीं सकती थी की मैं एक डॉक्टर भी हूँ | मुझे कभी कभी लगता मानो  डेंटल चेयर मुझे आवाज़ दे रही हो| सर्जिकल इक्विपमेंट मानो चीख रहें हो के अब लौट आओ मरियम जी

तो मैंने जैसलमेर जाकर एक क्लीनिक में अपनी प्रैक्टिस शुरू की | दंत चिकित्सक होने का सबसे बड़ा फायदा हैं के आपको अपने जीवन में समाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों को पूरा करने का समय मिल जाता है| तो प्रैक्टिस करने के साथ ही मैंने जैसलमेर में भी बच्चों को पढ़ाना शुरू किया | मेरे ससुर जी भी एक सेवानिवृत व्याख्याता हैं , उनसे भी मझे शिक्षा के शेत्र में काम करने की प्रेरणा मिली | 

कई बच्चों के माता पिता मेरे पास आते और उनकी आँखों में उनके  बच्चों की सफलता के सजे सपने मुझे अपने पिता के आँखों में बसे सपनों की याद दिलाते | वहीं जैसलमेर में बच्चों के साथ मेहनत करते हुए मुझे पता चला नवोदय विध्यालय और मॉडल स्चूल्स के बारे में जहाँ एक बार अगर आपके बच्चे का प्रवेश हो गया तो 12 वीं तक की पढ़ाई निशुल्क होती है और मेरा मानना है की अगर बच्चे  इतने साल एक अच्छे मार्गदर्शन में रहेंगे तो आगे भी अपने लिए सही विकल्प ही चुनेंगे

जैसलमेर आने के बाद जीवन समय की सुई ने रफ़्तार पकड़ी और कब मैं वहीं मशगूल हो गयी पता ही नहीं चला| एक डॉक्टर और एक शिक्षक के साथ साथ एक गृहिणी के रूप में दिन कब निकल जाते पता ही नहीं चलता पर कहीं कहीं मुझे एक खलिश थी की मैं पोखरण से दूर हूँ जहाँ हमारे समाज के लोगों को मेरी ज़रूरत हैं

यूँ तो जैसलमेर एक बड़ा शहर है , वहाँ सफल होने की सम्भावना भी ज्यादा है और मुझे मेरे पति के साथ रहने का भी सुख नसीब होता मगर मुझे लगने लगा कहीं कहीं ये मेरे फ़र्ज़ से मुँह मोड़ने  जैसा है |  

मेरे पिता को भी मेरा जैसलमेर में होना उतना पसंद नहीं आया क्योंकि  जैसलमेर से ज्यादा मेरे कौशल की जरूरत पोखरण को थी | मैंने दोबारा पोखरण लौटने की ठानी | मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानती हूँ  की मुझे ऐसे पति मिले जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया | मेरी पोखरण लौटने की बात पर भी उन्होंने मुझे रोका नहीं और आगे बढ़ने की प्रेरणा ही दी |

अब मैंने रुख किया पोखरण की ओर पर मुझे बिलकुल नहीं  पता था की मेरा नसीब एक बिलकुल ही नए मोड़ पर मुझे ले जाने वाला था

पोखरण - एक नए सफ़र की शुरुआत

पोखरणशायद 11 मई 1998 से पहले ये नाम शायद ही किसी ने सुना था लेकिन जब यहाँ धमाके हुए  तो पोखरण का नाम सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया भर में गूंजा | इतने धमाकेदार गाँव में होने के बावजूद अगर मैं अपने कौशल से कोई धमाका   करूँ तो ये शायद ये इस  गाँव की तौहीन होती |

पोखरण लौटने के बाद मैंने भी कुछ ऐसा ही करने का फैसला किया, पोखरण में एक भी अच्छा डेंटल हॉस्पिटल नहीं था| अगर मुझे अपना क्लीनिक यहाँ खोलना था तो मुझे ज्यादा सविधाएं लाने की ज़रूरत नहीं थी पर कहीं ना कहीं बच्चपन से ही 100 % देने की मेरी आदत ने मुझे कुछ शानदार करने को उकसाया |

राजस्थान के उतर पश्चिमी इलाक़ों  जैसे जैसलमेर , बाड़मेर  और जोधपुर के पानी में बहुत  ज्यादा मात्रा मैं फ्लोराइड पाया जाता हैंजिसकी वजह से यहाँ के निवासियों को हड्डी और दाँतों से जुड़ी समस्याओं का सामना छोटी उम्र से ही करना पड़ता है लेकिन यहाँ इतनीजागरूकता, साक्षरता और समृधी  नहीं है की वे अपनी मेडिकल समस्याओं को लेकर सीधा चिकित्सक के पास चले जाएँ |  

इसलिए मैंने यहाँ एक मल्टीस्पेशलिस्ट डेंटल हॉस्पिटल शुरू करने का सपना देखा | ये सपना जितना हसीन था उतना ही मुश्किल भी क्योंकि इस राह पर आर्थिक और भावनात्मक दोनों ही तरह की चुनौतियों से लड़ना था |  मेरा मानना है की जब आप ठान लें तो असंभव को भी संभव कर सकते हैं

एक बार फिर मेरे पिताजी का सबसे कीमती तोहफ़ा मेरी शिक्षा मेरे काम आई | बैंक मैं जब आप एक ऐसी प्रोफेशनल डिग्री लेकर जाते हैं तो आप पर भरोसा कई गुना बढ़  जाता हैं और ब्याज़  दर  उतने ही गुना घट जाती हैं | अगर आप ग्रामीण क्षेत्र में क्कुछ करने का सोचते  हैं तो सरकार भी आपकी मदद के लिए आगे आती है

इसी तरह बैंक, सरकार और मेरे परिवार की मदद से अगस्त 2019, मैंने अपने सपने को साकार किया और पोखरण डेंटल हॉस्पिटल की नींव रखी| यह पूरे  जैसलमेर जिले का पहला मल्टीस्पेशलिस्ट डेंटल हॉस्पिटल बना | मैंने यहाँ हर वो आधुनिक सुविधा लाने  की कोशिश की जो यहाँ के लोगो के काम सकें

अब अगली चुनौती थी के लोगों को कैसे समझाया जाएं के उनके लिए स्वास्थ्य  कितना ज़रूरी है ताकि वे अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग बने और उन तक  मेडिकल सुविधाएँ भी  पहुँचाई जा सकें| यहाँ कॉलेज में कम्युनिटी हेल्थ कैंपों में किए गए काम का अनुभव मेरे काम आया और मैंने लोगों तक निशुल्क चिकित्सा पहुँचाने के लिए हेल्थ कैंप लगाने का निर्णय लिया |

पोखरण के आस पास के हर छोटे बड़े गाँव कस्बे में मैंने  चिकित्सा शिविर आयोजित किये | वहाँ के लोगों तक इन शिवरों की जानकारी पहुँचाने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया| अलग अलग गाँव में जाने पर मैंने पाया की हमारे क्षेत्र की महिलाएं कितनी ही  दिक्कतों  का सामना करती है लेकिन खुल कर अपनी तकलीफों को बयान  नहीं कर पाती |   

इसलिए मैंने जहाँ भी शिविर लगाया वहां ज्यादा से ज्यादा महिलाओं तक पहुँचने की कोशिश की | चाहें उनकी तकलीफ़ दंत रोग से जुड़ी  हो या कुछ और  मैंने हर मुश्किल में उनका साथ देने की कोशिश की | इन शिविरों से जो भी मरीज़ चिकित्सा के लिए हमारे डेंटल हॉस्पिटल आते उन्हें हमने निशुल्क चिकित्सा देने का हर मुमकिन प्रयास किया

चिकित्सा के साथ ही साथ अब मैंने बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ  के संदेश को भी हर उस व्यक्ति के साथ बांटना शुरू किया जो मेरे संपर्क में आता| हमारे चिकित्सालय के रिसेप्शन काउंटर पर  भी एक सिग्नेचर बुक पड़ी हैं हमारे यहाँ आने वाले हर व्यक्ति से चाहे वो बड़े से बड़ा राजनेता हो, चिकित्सक हो या एक आम आदमी हो हां उनसे यहाँ हस्ताक्षर ज़रूर करवाते हैं , इस से वे ये प्रण लेते हैं की वे कभी लिंग जाँच नहीं करवाएंगे और बेटी और बेटे को समान अधिकार देंगे |

 

साथ ही साथ हमने सरकारी अस्पतालों में जाकर बेटी को जन्म देने पर जन्मोत्सव मना कर , केक काटकर, नारियल देकर, बेटी को जन्म देने वाली माँ को माला पहनाकर लोगों को बेटी के जन्म पर भी उतना ही खुश होने का संदेश दिया | मैंने हमेशा चाहा की मुझे देखकर हमारे समाज की लड़कियाँ प्रेरित  हों और वे भी  कुछ करने की ठान ले और ज्यादा से ज्यादा महिलाएं आगे आयें, डॉक्टर , इंजीनियर , आईएस बनें |  

बेटी और बेटों के बीच के अंतर को मिटाने की ओर ये  हमारे छोटा छोटे  प्रयास भरे कदम हम हर रोज़ उठाते हैं ताकि एक दिन हम गर्व से ना  केवल कह सकें बल्कि हकीयकत में इस वाक्य “मेरा देश बदल रहा है , आगे  बढ़ रहा है ” को जी सके।

मैंने पाया है के जब आप एक नेक इरादे को लेकर आगे बढ़ते हैं तो ख़ुदा आपके साथ चलने के लिए और नेक लोगों को आपके पास भेज देता है| ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ जैसे जैसे मैंने पोखरण की उन्नति के लिए कुछ कदम उठाये तो मुझे बहुत लोगों का प्यार मिला|   

हमारी जिला प्रमुख अंजना मेघवाल जी और महिला अधिकारिता विभाग की सरिता मौर्य जी द्वारा  मुझे बहुत मार्गदर्शन मिला, उन्होंने हमेशा मुझे हर कार्यक्रम , हर समारोह में मुझे आमंत्रित कर  मेरा मान बढ़ाया | 

राजस्थान की रक्त दान के क्षेत्र में सबसे बढ़ी NGO लालबुंद जीवन दाता सेवा समिति ने मुझे जैसलमेर जिलाध्यक्ष बनाकर मुझे एक गौरव पूर्ण ज़िम्मेदारी से नवाजा |

इसी बीच वर्ष 2019 ने हमसे विदा ली और 2020 ने हमारे दरवाज़ों पर दस्तक दी पर कौन जानता था की ये दस्तक देने वाला ये साल हमारे दरवाज़ों को ही महीनों के लिए बंद करवा देगा | 

 

हमारे ही परिवार की सदस्या और पंचायत समिति  सांकडा की पूर्व महिला प्रधान अमतुल्लाह मेहर को हमने एक सड़क दुर्घटना में खो दिया था | वे दुर्घटना के 4 दिन तक हमारे साथ थी उस दौरान हमारे गाँव के सभी लोग मदद के लिए आगे  आए  और हमें रक्त दान के लिए  किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा | लेकिन मैंने महसूस किया के किसी आम आदमी को इस तरह की परिस्थिति में कितनी मुश्किल हो सकती है| 

इसीलिए 27 फरवरी 2020 को हमने उनकी  की पुण्यतिथि पर एक रक्त दान शिविर आयोजित करने का फैसला किया| इसके साथ हमने एक चिकित्सा शिविर का आयोजन भी किया जिसमे 10 विशेषज्ञ चिकित्सकों  ने आकर स्थानीय मरीज़ों की परेशानियों को हल किया |  इस दिन पहली बार ऐसा हुआ की पधारे हुए डॉक्टरों ने भी रक्त दान कर आए हुए लोगों को रक्त दान करने के लिए  प्रेरित किया |   

इसी तरह छोटे छोटे कदम बढ़ाते हुए अब मैं मेरे समाज की उन्नति की ओर अग्रसर  हूँ | एकओर  मैं एक बड़े चिकित्सालय के डायरेक्टर के तौर पर चिकित्सालय को आगे बढ़ाने  में लगीं हूँ और दूसरी और मेरे समाज की बेटियों को अच्छी से अच्छी शिक्षा कैसे मिले इस परभी  काम कर रही हूँ | 

इसी दौरान कोविड 19 के फैलने की बजह से हुए लॉक डाउन  में भी मैंने एक डॉक्टर के तौर पर अपने फ़र्ज़ को निभाया | मरीज़ों को किसी  तरह की कोई तकलीफ़ न हो इसलिए समाचार पत्रों में मैंने अपने मोबाइल नंबर प्रकाशित करवा फ़ोन पर परामर्श जारी रखा | 

लक्ष्य ज़िंदगियाँ बदलने का

चिकित्सा और शिक्षा हर इंसान  का मौलिक  अधिकार है और इसे उन तक पहुँचाने के लिए अगर मैं एक ज़रिया बन सकूँ ,बस यही मेरी कामना है| पोखरण और इसके आस पास के क्षेत्रों में ये दोनों ही मूलभूत सुविधाए आज भी  दुर्लभ हैं और ऐसे कई क्षेत्र हैं हमारे देश मेंमेरे जीवन में अगर में इनमे से कुछ जगहों तक भीअपने  ज्ञान रूपी प्रकाश पहुंचा सकी तो मेरा जीवन सफल है|  

मैं आज तक अपने समाज में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जो कर सकी मैंने किया है और आगे भी करती रहूंगी| मेरा सपना है के एक दिन हमारे समुदाय में बेटियां भी बेटों से कंधे से कंधा मिलाकर  अपने पैरों पर खड़ी हों और हमारे समाज का अपने देश का नाम रोशन करें

शिक्षा के लिए एक मज़बूत नींव रखना ही हमारी  पहली प्राथमिकता होनी चाहिए इसलिए मै  एक ऐसा संसथान शुरू  करना चाहती हूँ जहाँ छोटे बच्चों को शुरुआत से ही आगे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार किया जाए और उन्हें नवोदय और मॉडल स्कूल जैसे संस्थानों तक पहुंचा दिया जाये जहाँ से वे अपने लिए आगे का रास्ता खुद चुन सकें|

मैं WHO, UNICEF जैसी संस्थाओं से जुड़कर शिक्षा  और चिकित्सा को हर उस छोटे से छोटे गाँव तक पहुँचना चाहती हूँ जहाँ हमारी सरकार आज तकभी  नहीं पहुंच पायी  हैं |   

मेरी और से एक संदेश

मेरे पिता ने मुझे हमेशा सिखाया की किसी राजकुमार का इंतज़ार मत करो, अपने जीवन के हीरो तुम खुद हो अपने सपनों को साकार करने के काबिल बनों | यही बात मैं हर माता पिता से कहना चाहूँगी के आप भी अपने बच्चों को चाहे बेटी हो याँ  बेटा उन्हें अपने पैरो पर खड़ा होने में सहयोग कीजिये की उन्हें किसी और पर निर्भर होने की सीख दीजिये | आत्मनिर्भरता उन्हें एक बेहतर और कामयाब इंसान बनाएगी |  

अपने बच्चों को ज़मीन से जुड़े रहना सिखाए चाहे उनकी ज़िंदगी में वे कितनी ही बुलंदियों को छू  ले, उन्हे अपनी माटी का क़र्ज़ भूलने दीजिये और फिर देखिये कैसे भारत दोबारा सोने की चिड़िया बनता है |

तो हमारे ज़िद्दी साथियों ये थी दास्तान मेहर समुदाय से निकली पहली डॉक्टर डॉ मरियम मेहर की दास्तान | किताबों से रिश्ता जोड़ने से लेकर एक डेंटल हॉस्पिटल खोलने तक मरियम का सफ़र चुनौतियों भरा तो रहा लेकिन उनकी  जिंदगियां बदल देने की ज़िदही  आज उन्हें आज  हमारे मंच पर  भी ले  आयी  | 

इनकी दास्तान हमें दिखाती हैं के जब आपके सफलता के मायने खुद के स्वार्थ से बढ़कर लोगों की  सेवा से जुड़े हों तो आपको बुलंदियाँ छूने  से कोई नहीं  रोक सकता |   

हम एक बार फिर लौटेंगे लेकर एक और ज़िद से जन्मी दास्तान जो आप में जगा देगी जोश और जुनून तब तक के लिए
Stay passionate, Stay Stubborn 

मरियम से संपर्क करें

मरियम का सफ़र उनके शब्दों में

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