‘द माउंटेन किड ’ काम्या कर्थिकेयन्न

‘द माउंटेन किड ’ काम्या कर्थिकेयन्न

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नमस्कार हमारे ज़िद्दी साथियों !

हम एक बार फिर लौट आए  हैं,  दृढ़  निश्चय और अटूट संकल्प भरी  ज़िदी  दास्तां लेकर | हम आपको ऐसी कहानियाँ  पहले भी सुना चुके हैं लेकिन ये उन कहानियों से बिल्कूल  अलग है। 

अच्छा पहले कुछ सवालों का जवाब दीजिए, 

क्या हिमालय के मुश्किल रास्ते  किसी के लिए 7  वर्ष की उम्र में खेल के मैदान की तरह  हो सकते  है ?

जिन पहाडों से बड़े बड़े सूरमा भी घबराते हों, आप 8 की उम्र में ऐसे पहाड़ों पर चढ़ने के लिए प्रशिक्षण के बारे में सोच सकते है?

यां आप 10 साल की उम्र में एवरेस्ट की ऊँचाइयों को छू  लेने का ख़्वाब देख सकते है ?

हम में से ज्यादातर लोगों के लिए जवाब देना भी शायद मुश्किल  होगा लेकिन , क्या आप विश्वास करेंगे अगर मै  कहूँ के एक 12 साल की लड़की जो इन सभी सवालों का जवाब एक गूंजती हुई हाँ में दे सकती हैं|

हम बात कर रहे हैं काम्या कर्थिकेयन्न की | एक नौ सेना अफसर की बारह साल की बेटी जिसने पर्वतारोहण  के क्षेत्र में एक के बाद कई  रिकॉर्ड बनाए हैं | 3 साल की नन्ही उम्र से  काम्या ने प्रकृति माँ के साथ रहकर खुशियाँ खोजना शुरू कर दिया| आज पर्वतारोहण उसके लिए एक  जुनून बन चुका है|  

आज हम सुनेंगे इस साहसी युवती की कहानी उसके माता-पिता के शब्दों में | तो आइये सुनाते है आपको कंपकंपा  देने वाली ये  कहानी  | इस नन्ही सी बेटी के साथ चलेंगे बर्फ भरे पहाड़ों में और मिलेंगे प्रक्रति के विभिन्न पहलुओं से |

सह्याद्री- काम्या का खेल मैदान

मैं लावण्या के. , भारतीय नौ सेना के ऑफिसर कमांडर एस कर्थिकेयन्न की धर्म पत्नी और  काम्या कर्थिकेयन्न की माँ । आज मै  आपको काम्या की हमारे घर के आंगन में खेलने से लेकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने तक के सफ़र की  दास्तान सुनाउंगी ।   

मेरे पति हमेशा से एक रोमांचक जीवन जीने के शौकीन रहे है । वे हमेशा से खेल में अग्रणी थे और पर्वतारोहण से उन्हें हमेशा आकर्षण रहा है । 2007 में जब, काम्या पैदा वाली थी, तभी मेरे पति आने वाले वर्ल्ड मिलिट्री गेम्स के लिये भारतीय नौ सेना की टीम के साथ स्काई डाईविंग का प्रशिक्षण ले रहे थे। 

वर्ल्ड मिलिट्री गेम्स उस साल भारत में होने वाले थे इसी वजह से उनकी स्काई डाईविंग टीम प्रशिक्षण के लिए अमरीका गयी । खुशकिस्मती से मुझे भी उनके साथ जाने का मौका मिला और मेरे साथ मेरे गर्भ में काम्या ने भी थी जिसे इस दुनिया में अपनी आंखे खोलना अभी बाकी  था । तो आप कह सकते है कि काम्या का जन्म  ही साहसिक  माहोल में हुआ था ।

जब हमारी नन्ही परी ने इस दुनिया में कदम रखे, उसी  के साथ  हमारे एक नए किन्तु मज़ेदार सफ़र की शुरुआत हो चली थी । उस वक़्त हम लोनावाला में रहते थे, जो की भारत के  जैव विविधता वाले  हॉटस्पॉट में से एक है । हमारी हर सुबह का  सूरज  प्रकृति की गोद में ही  उदय हुआ करता  था । 

जब काम्या 3 साल की हुई तो उसके पिता एक पर्वतारोहण प्रशिक्षण के लिए हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट गए । काम्या मुझसे पूछा करती “पापा कहाँ हैं ?” और में हमारे घर के पीछे स्थित एक पहाड़ी की और ऊँगली करके कह देती के “वे हिमालय में हैं ।” काम्या को लगने लगा के हिमालय उसी पहाड़ी के पीछे हैं ।

जब उसके पिता लौट आए तो उसकी  जिज्ञासा को शांत करने के लिए, हमने उस पहाड़ी पर चढ़ाई की । इसने हमारे  आगे पूरा  नया जहाँ खोल दिया । मेरे पति हमारे साथ सप्ताह ले अंत के  दो दिन सिर्फ शनि और रविवार को ही हमारे साथ समय बिता पाते हैं और इन दो दिनों, लोनावाला की गलियाँ पर्यटकों से भरी होती है तो आस पास की पहाड़ियाँ  हमारी ‘वीकेंड गेट अवे’ बन गयीं ।

हर हफ्ते हम एक नई पहाड़ी खोज लाते और निकल पड़ते एक नए सफ़र पर ।काम्या का प्रकृति के साथ स्नेह हर बार और अधिक बढ़ता रहा ।हालांकि में एक निवर्तमान व्यक्ति नहीं हूँ लेकिन काम्या की चिंता मुझे उन दोनों के साथ खींच लाती । काम्या सह्याद्री में बिताये हर उस पल का बहुत आनंद लेती और धीरे धीरे  यही उसके  लिए खेल का  मैदान बन गए ।

“पिताजी पहाड़ों में करते क्या हैं ? ”

काम्या का पहाड़ों के लिए प्यार देख कर, हमने छुट्टियों में  हिमालय पर जाने का प्लान बनाया | भारत का  उत्तरी क्षेत्र  जो दुनिया भर के सबसे हसीन पहाड़ों के लिए जाना जाता है , बस वही हमारी मंजिल बन गए | हमने कश्मीर में गुलमर्ग को खोजा जो धीरे धीरे हमारे लिए वही वार्षिक तीर्थ यात्रा  का  मनचाहा स्थान बन गया | 

पहाड़ों का लुफ्त उठाने के साथ साथ ही हमने गुलमर्ग में स्कीइंग में बेसिक ट्रेनिंग कोर्सेस   से लेकर  एडवाँस ट्रेनिंग  कोर्सेज किये | 

2014 में, हमने मेरे  पति के एक दोस्त (जो एक पर्वतारोही भी है) के साथ लद्दाख की यात्रा की । हालाँकि यह लगभग मध्य अक्टूबर का समय था और बर्फ गिरना शुरू हो चुकी थी , मेरे पति उस साल ‘माउंट स्टोक कांगड़ी’ के शिखर पर चढ़ना चाहते थे।

हम  सोनम वांग्याल जी  (भारत के 1965 के एवरेस्ट अभियान के पर्वतारोहियों में से एक) से मिले, जो अपने घर से आईएमएफ (इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन) का स्थानीय कार्यालय चलाते हैं और माउंट स्टोक कांगड़ी में पर्वतारोहियों को परमिट देने के लिए प्राधिकारी हैं|

चढ़ाई का मौसम लगभग समाप्त हो गया था और वांग्याल जी उन्हें चढ़ाई करने की अनुमति देने में संकोच कर रहे  थे। हम अक्सर हम  उनके घर जाते थे, जहाँ वह अपने जीवन के 80 वर्षों के अनुभवों के अपने खजाने की  कहानियों के साथ हमें आश्चर्य चकित करते हुए, काम्या के लिए अपने ऑर्किड से ताज़े सेब तोड़कर लाते। काम्या हमेशा इन कहानियों को बहूत ही रुचि के साथ  सुना करती । वांग्याल जी बात करने के लिए एक बहुत ही दिलचस्प व्यक्ति थे|  उन्हीं  से हमने सीखा के अपने जीवन काल में कहानियाँ संगृहित  करना और उन्हें पारित करते रहना कितना महत्वपूर्ण है| इसीलिए आज काम्या, मैं और मेरे पति कहानियों और अविस्मरणीय पलों को संगृहित करने की राह पर अग्रसर हैं|   

उस वर्ष माउंट स्टोक कांगड़ी पर चढ़ने की अनुमति के लिए मेरे पति आखिरकार वांग्याल जी को समझाने में सक्षम रहे । वे  सिर्फ एक मार्गदर्शक और अपने पर्वतारोही मित्र के साथ जाने वाले थे। हम उनके साथ स्टोक गांव गए जहां से ट्रेक शुरू होता है। अपनी मासूम आवाज़ में कुछ विश्वास के साथ काम्या ने पूछा “पापा , मैं इस पहाड़ पर कब चढ़ने जा रही हूँ? बहुत जल्द मेरे बच्चे “  पति ने कहा और हमें कहाँ ही पता था कि यह वास्तव में इतना जल्द ही सम्भव  होने वाला था।

हालांकि वे उस वर्ष शिखर पर नहीं पहुंच सके लेकिन यह मेरे पति के लिए एक उल्लेखनीय अनुभव था। वह अगले साल नौसेना की टीम  के लीडर के रूप में लौटे और अपनी टीम के साथ माउंट स्टोक कांगड़ी (लद्धाख में स्थित भारत की सबसे ऊँची चढ़ सकने वाली चोटी ) और माउंट कांग यात्से (मरखा वैली में स्थित हिमालय की सबसे ऊँची चोटियों में से एक) दोनों ही पर्वतों के शिखर तक पहुंचे।

जब  मेरे पति और नौसेना की टीम  अभियान के लिए तैयारी करती , काम्या और मैं उनके साथ नियमित सैर और सप्ताहांत ट्रैकिंग के लिए जाते । इससे धीरे-धीरे हमारे धीरज और कुशलता में सुधार होने लगा।

जब मेरे पति अपने पर्वतारोहण अभियानों पर जाते, तो काम्या के लिए यह ऐसा था जैसे वह कुछ समय के लिए मानो गायब  ही हो गए हो |  वह मुझसे अक्सर पूछा करती  कि उसके पिता पहाड़ों में क्या कर रहे थे। मैं वास्तव में उसे कभी भी संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती  थी , इसलिए एक दिन मैंने उससे कहा “चलो खुद पता करो ” और इस तरह साहस  और खोज की एक अद्भुत यात्रा की शुरूआत  हुई।

हिमालय से दोस्ती

अपनी बेटी की जिज्ञासा को पूरा करने के लिए, हमने  हिमालयों में एक नए सफ़र की शुरुआत की । आस पास  की कुछ पहाड़ियों पर चलने और ट्रेकिंग करने के बाद, हम अच्छे शारीरिक रूप में थे और अच्छी तरह से ट्रेकिंग में आने वाली कठिनाइयों  से वाकिफ थे।

काम्या की कम उम्र को ध्यान में रखते हुए, हमने उत्तराखंड में चंद्रशिला (13000 फीट) के लिए एक ट्रेक करने का फैसला किया | इसे आसान-मध्यम कठिनाई वाला  ट्रेक माना जाता है | हमने एक विश्वसनीय ऑपरेटर बुक किया और चल पड़े चंद्रशिला की ऊँचाइयों को नापने | 

सिर्फ 7 साल की उम्र में काम्या ने एक टीम में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया और सहजता से समूह का हिस्सा बन गया। वह पहाड़ की चोटी को खड़ी नज़र से देखती थी मानो कह रही हो  मैं तुम सबसे ऊपर मिलने रही हूँ।” नियमित जीवन की सुख-सुविधाओं से दूर जंगली खुले स्थानों में रहने के कारण, उसे आज़ादी मिली और हम सभी एक ऐसी तरह से जुड़े जैसा कि घर पर संभव नहीं था। 

जब हम शिखर पर पहुँचे, तो हमारे चारों ओर के पहाड़ों की विशालता और विस्तार  ,  विनम्र और मंत्रमुग्ध कर देने वाली  महिमा थी इन पहाड़ों की । यह ट्रेक  इतना उल्लेखनीय अनुभव था कि इसने हमें अगले साल फिर से  वापस  जाने के  लिए रोमांचित कर दिया । इस बार हम अपने करीबी परिवार और दोस्तों के साथ हर की दून (13500 फीट) के  ट्रेक पर गए | हम अपने धीरज को परखना चाहते थे और खासतौर पर काम्या  थकान का सामना कैसे करती है |  इसलिए हमने हर की दून के बाद सीधा केदार कांठा (13500 फीट) के लिए निकल गए।

हमें लगातार दस दिनों तक पहाड़ों में रहना था। हालाँकि गाँव थे और लोग बहुत मित्रपूर्ण  थे, लेकिन 8 साल की बच्ची के लिए यह काफी चुनौती भरा था। काम्या ने हर चुनौती का इतनी सहजता से जवाब दिया कि मुझे कभी नहीं लगा कि वह किसी कठिनाई का सामना कर रही हैं। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती गई और हम खड़ी चढ़ाइयों की और  बढ़ते गए, काम्या अपनी उर्जा संरक्षण करने पर ध्यान केंद्रित करने लगी | वो अपनी कहानियों को शाम के लिए बचा लेती । उस ट्रेक के अंत में वह पहले से ही एक अनुभवी ट्रेकर बन चुकी थी।

तो इस तरह महान हिमालय हमारी नन्ही सी परी के दोस्त बन गयी क्योंकि उसका साहस भी भला  हिमालय से कम कहा था | 

एवरेस्ट - एक शानदार ख़्वाब

2017 में, भारतीय नौसेना एक एवरेस्ट अभियान के लिए जा रही थी और मेरे पति टीम का हिस्सा बनने के लिए  कड़ी मेहनत कर रहे थे। उन्हें बहुत कठोर परिश्रम करना होता था |  काम्या  सीखने के लिए हमेशा उत्सुक रहती और हमेशा प्रशिक्षण का हिस्सा बनने की कोशिश करती थी।

काम्या ने एक दिन अपने पिता  से पूछा “क्या मैं आपके साथ बेस कैंप तक आपको अलविदा कहने आ  सकती हूं?” जिस पर उन्होंने उत्तर दिया “क्यों नहीं , लेकिन केवल तभी जब आप मुझे यह साबित कर दें कि आप इस तरह के साहसिक कार्य के लिए तैयार हैं!” मेरे पति के ये शब्द एक चिंगारी की तरह थे जिसने काम्या में एक ज्वाला को प्रज्वलित कर दिया हो | काम्या अब अपनी क्षमता से आगे बढ़कर मेहनत करने लगी | 

वह पहले से ही नियमित दौड़ के लिए जा रही थी, लेकिन अब हमने अन्य मसल्स के समूहों का अभ्यास करने के लिए उसकी ट्रेनिंग में बदलाव किये। वह अब सप्ताह में 6 दिन ट्रेनिंग करने लगी, जिसमें दो  दिन साइकिल चलाना, दो  दिन दौड़ना और दो दिन चलना था।

पापा को यह साबित करने के लिए कि हम उनके साथ आने के लिए तैयार हैं काम्या और मैंने , एक योजना बनायीं। हमने रूप कुंड (16400 फीट) तक जाने का सोचा । यह हमारी पिछली चढ़ाइयों की तुलना में सीधा 3000 फीट ऊंचा था, लेकिन काम्या के शारीरिक स्तर और प्रेरणा को देखकर मुझे लगा कि हम तैयार हैं।

जब हम ट्रेक के लिए गए, तो हिमालय में फिर से जाना घर वापसी जैसा था। मौसम भी मेहरबान था और हमने यात्रा में हर पल का आनंद लिया। ऊंचाई और  कम घनत्व वाले वातावरण ने कुछ चुनौतियाँ पेश कीं लेकिन काम्या कहाँ रुकने वाली थी । हम उस समय सीमा के भीतर शिखर पर पहुंच गए थे जिसकी हमने योजना बनाई थी और काम्या के उत्साह ने मुझे भी प्रेरित रखा।

वापस आने के बाद, हमारे पास यह साबित करने वाला प्रमाणपत्र था कि काम्या  एवरेस्ट बेस कैंप के लिए तैयार है जो लगभग 17000 फीट पर है। दुर्भाग्य से, मेरे पति अभियान के लिए जा रही नौसेना टीम में नहीं जा सके। हम स्थिति से थोड़े नाखुश थे लेकिन माता-पिता के रूप में हमने अपने वादे को पूरा करने का फैसला किया।

यही हम काम्या को भी  सिखाना चाहते थे, प्रतिकूल परिस्थितियों के  बावजूद भी हमेशा  अपने शब्दों  पर डटे रहना है । जैसा कि उसने अपना वादा पूरा किया था, अब हमारी बारी थी  उसकी बात मानने की | 

मई 2017 में, काम्या और मैं देश के बाहर अपने पहले ट्रेक के लिए रवाना हो गए क्योंकि मेरे पति अपनी सेवा आवश्यकताओं के कारण हमारे साथ नहीं आ सके। हमने  ‘लुक्ला ’के लिए उड़ान भरी, जो एक छोटा हवाई अड्डा है जिसे दुनिया के सबसे खतरनाक हवाई अड्डों में से एक माना जाता है| लेकिन उसके आसपास के नजारों  की सुंदरता बेहद आकर्षक और लुभावनी थी।

हमने एक बहुत ही अलग संस्कृति के बीच बेस कैंप पर अपनी चढ़ाई शुरू की। सभी के साथ काम्या बहुत अच्छे से घुल मिल गयी । हम हर दिन नए इलाके और नई प्रकार की वनस्पति देख रहे थे। यह लगभग उनके लिए एक लाइव भूगोल की कक्षा की तरह था, जहां शिक्षक स्थानीय लोग और महान हिमालय थे। हमारे आसपास के सभी लोगों के पास ‘दाल-भात’ की शक्ति थी, क्योंकि लगभग दिन के हर भोजन के लिए वे ‘दाल – भात ’ ही लिया करते।

मुझे उसकी क्षमताओं पर भरोसा था और उसने खुद को बहुत अच्छे से निभाना  सीख लिया था। इसलिए मैं  चिंतित नहीं था। प्रत्येक कदम के साथ प्रकृति के साथ हमारा बंधन मजबूत हुआ। बेस कैंप पहुंचने पर, हमें नौसेना टीम से मिलने का मौका मिला और उन्हें फिर से देखना एक पारिवारिक मिलन जैसा था। बेस कैंप में 9 साल की एक बच्ची को देखना एक अनोखा दृश्य था  और हर कोई उसकी कहानियों को सुनने के लिए उत्सुक था। 

काम्या एवरेस्ट बेस कैंप में ट्रेक करने वाली दुनिया की दूसरी सबसे कम उम्र की लड़की बन गई, लेकिन यह सफ़र कभी भी रिकॉर्ड स्थापित करने के बारे में नहीं था । 

यह काम्या को एक  अच्छे स्वभाव  और बहुआयामी व्यक्तित्वबनाने का सफ़र था और पर्वतारोहण ने हमें ऐसा करने के लिए  सक्षम बनाया।

एक रिकॉर्ड तोड़ जन्मदिन उपहार

एवरेस्ट बेस कैंप में ट्रेक पर अपनी सफलता के बाद, काम्या स्वतः प्रेरित होने लगी | हम भी यह महसूस कर पा रहे थे कि वह एक ट्रेकर से पर्वतारोही बनने के लिए तैयार है। पर्वतारोहण समुदाय में, माउंट स्टोक कांगड़ी को ‘विश्वविद्यालय’ कहा जाता है, जहाँ ट्रेकर्स पर्वतारोही बनते हैं ।

इसलिए उसके 10 वें जन्मदिन के लिए, हमने उसे यूनिवर्सिटी  ले जाने का फैसला किया । लेकिन पहले हमें उसकी ट्रेनिंग को और परिपक्व  करना था और कुछ तकनीकी कठिनाइयों को भी दूर करना था। माउंट स्टोक कांगड़ी 20000 फीट ऊंचा है, और 10 साल के बच्चों के लिए यह एक  सामान्य खेल का मैदान नहीं हैं । यह गंभीर मसला था। 

क्रैम्पन्स ’(बर्फ पर चलने के लिए पर्वतारोहण स्पाइक्स) के उपलब्ध साइज़  के लिए उसके पैर बहुत छोटे थे।

किसी तरह हम कुछ नया करने में कामयाब रहे और उसके साइज़  के लिए कुछ उपकरणों को इंजीनियर किया । 

एक बार फिर हम परमिट के लिए मिस्टर वांग्याल के दरवाजे पर दस्तक देने गए। वह शुरुआत में काम्या की उम्र के कारण थोड़ा आशंकित थे क्योंकि उनकी एक बड़ी पोती थी जो काम्या की उम्र की थी।

काम्या  के चढ़ाई के रिकॉर्ड और उस पर हमारे विश्वास ने वांग्याल जी  को एक बार फिर आश्वस्त किया। मेरे पति ने 5 साल पहले जो वादा किया था वह पूरा होने के कगार पर था। वह पहले से ही अपने पिछले अनुभवों के कारण इस  इलाके और यहाँ की कठिनाइयों से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे ।

हमने ट्रेक शुरू किया और बेस कैंप तक पहुँच गए जहाँ से हमें समिट करना था  और एक दिन में वापस आना होगा। हमने अपनी  चढ़ाई 06 अगस्त 2016 को रात 11 बजे रात में शुरू की क्योंकि हमें शिखर पर चढ़ना था और सूरज के  बर्फ पिघलना शुरू होने से पहले नीचे उतरना शुरू कर देना था , क्योंकि इसके बाद नीचे आना बहूत  मुश्किल हो जाता।

चढ़ाई घंटे दर घंटे लगातार चलती रही और हर ढलान पर हमने महसूस होता  जैसे कि वह शिखर हो। एक निश्चित बिंदु के बाद हमें  थकान शुरू हो गई और मैंने अपने पति से भी कहा “आपने मुझे इसमें खामखाँ ही फंसा दिया”। मैं लगातार चढ़ाई के साथ बहुत थक गयी थी, हालांकि मैं इतने सारे ट्रेक पर गयी थी।

उन्होंने सिर्फ एक वाक्य कहा  “यदि तुम यहां से वापस जाती हो, तो यह काम्या के दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ेगा ।” काम्या के सामने एक हारे हुए इंसान की तरह आने का ख्याल मात्र  ही मेरे लिए आग लगा देने वाला था। मुझे एक दम से मनो 440V का झटका लगा और मुझे चढाई के लिए एक नई उर्जा मिली। काम्या , हमारी 10 साल की परी, इतनी मुश्किलों के आगे भी पुरे जज्बे के साथ बिना किसी शिकायत के आगे बढती रही।

शिखर पर पहूँचना  एक परिवार के रूप में हम तीनों के लिए एक शानदार क्षण था। काम्या को इस बात की परवाह नहीं थी कि वह 20000 फीट ऊंची चोटी का शिखर हासिल करने वाली दुनिया की सबसे कम उम्र की पर्वतारोही बन गई हैं; बल्कि उसने मुझे गले लगाया और बहुत खुश हुई कि मैंने उसके साथ शिखर तक का सफ़र पूरा किया |

लौटते वक़्त काम्या गाइड के साथ हमसे ज्यादा तेजी से आगे बढ़ी और हम लगभग एक घंटे बाद बेस कैंप पहुंचे। मैंने तुरंत काम्या की तलाश की और वह रसोई में बैठी, सुडोकू को हल करते हुए , भयावह ठंड में अपनी  गर्म मैगी का आनंद ले रही थी।

वह वहां इतनी सादगी से बैठी थी, जैसे  कुछ हुआ ही  नहीं। उसके पिता उसके पास गए और उसे बताया कि उसने एक विश्व रिकॉर्ड बनाया है और उसने कहा “हां, पापा मैं  जानती  हूं।” और फिर पूरी तरह मौन में चली गयी । हमें ऐसा लगा जैसे वह हमें संकेत दे रही है कि वह हर उस चुनौती के लिए तैयार है जो उसके रास्ते में आने वाली है।

मिशन ‘साहस’

 वर्ष 2017 ने काम्या  के पर्वतारोहण के लिए बढ़ते प्यार को चिन्हांकित  किया, वह अपने रास्ते में आने वाली हर चुनौती  के लिए बिल्कुल तैयार थी और नई चुनौतियों और नए क्षितिजों के लिए आगे बढ़ रही थी। उसकी क्षमताओं में हमारा विश्वास बहुत बड़ा था और हम धीरे-धीरे बड़ी चुनौतियों की ओर जाने के लिए तैयार थे।

हमें एक्सप्लर्स ग्रैंड स्लैम ’के बारे में पता चला, जो सभी सात महाद्वीपों में सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ने और उत्तर और दक्षिण ध्रुवों पर स्की करने के लिए एक मिशन है। हमने इस चुनौती के सफ़र में भाग लेने का फैसला किया।

हमने इस  प्रयास को SAHAS नाम दिया। काम्या इसे  2022 तक इसे  पूरा करने का लक्ष्य रखती  हैं, ताकि महज 14 साल की उम्र में यह उपलब्धि हासिल की जा सके। वर्तमान रिकॉर्ड 20 साल की उम्र में जापान के मारिन मिनामिया के नाम  है और दुनिया भर में केवल 63 पर्वतारोहियों (सिर्फ 14 महिलाओं सहित) ने आज तक एक्सप्लोरर  ग्रैंड स्लैम पूरा किया है।

इस मिशन के माध्यम से हम लोगों को जीवन के एक बाहरी तरीके को अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। हम भारतीय महिलाओं को वो सब कुछ हासिल करने की प्रेरणा देना चाहते है जो वे हासिल करना चाहती है। इस छोटी से  उम्र में काम्या की उपलब्धियाँ किसी मुर्दे में  भी  प्रेरणा का संचार कर सकती  हैं और उसे अपने क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करने   का संदेश देती हैं ।

माउंट किलिमंजारो (अफ्रीका)

वर्ष 2017, काम्या के जीवन में एक ज़िन्दगी  बदलने वाला वर्ष था।इसी वर्ष एक और अद्भुत अवसर प्रस्तुत हुआ माउंट स्टोक कांगड़ी के शिखर पर पहुंचने के बाद, काम्या पर्वतारोहण समुदाय में लोकप्रिय हो गयी  थी।

देश के विभिन्न हिस्सों से हमें काम्या की उपलब्धि के लिए बधाई मिल रही थी । इन  कॉल में से एक बहुत विशेष था, और यह सबसे कम उम्र के भारतीय एवरेस्ट पर्वतारोही के ट्रेनर थे। वह बहुत ही आत्मीय थे और जब उन्हें हमारे प्रोजेक्ट SAHAS के बारे में पता चला, तो उसने काम्या को अपनी टीम में शामिल करने की बात कही , जो माउंट किलिमंजारो (18652 फीट) पर  एक अभियान के लिए जा रही थी। यह अफ्रीका की सबसे ऊँची चोटी है| 

मेरे पति व्यस्त थे और हम यात्रा में केवल दो लोगों का खर्च वहन कर सकते थे, हमने फैसला किया कि मैं काम्या के साथ जाऊंगी । एक्सपेडिशन की टीम के सदस्य, हालांकि अजनबी थे , पर बहुत मेहमाननवाज थे। वे कम उम्र में काम्या की क्षमताओं और दृढ़ संकल्प से चकित और प्रेरित थे।

किलिमंजारो की अपनी चुनौतियाँ थीं। 14000 फीट के बाद चढ़ाई को बनाए रखना बहुत आसान नहीं था क्योंकि तापमान बहुत तेज़ी से कम ज्यादा हो रहा था । फिर भी ऊपर वाले  की आशीष  रही कि हम अच्छे समय में ज्वालामुखी के रिम तक पहुँचने में सक्षम रहे । इस शिखर तक पहुँचना बहुत थकाऊ था लेकिन इसने हमें अगली चुनौती से लड़ने के लिए  भी  अब  तैयार  खड़े थे।

माउंट एल्ब्रस (रूस / यूरोप)

मिशन SAHAS को शुरू करने के बाद हमारा जीवन एक निरंतर यात्रा बन गया। हम एक पहाड़ को समिट करते और फिर अगले की तैयारी शुरू करते । हमारा अगला लक्ष्य माउंट  एल्ब्रस (18514 फीट) था। शिखर तक पहुँचने के अलावा, हमने काम्या को भी स्की करने की चुनौती दी थी।

यह एक आम ग़लतफहमी है कि एक बार जब आप किसी भी ऊंची पर्वत चोटी पर चढ़ जाते हैं, तो उस ऊंचाई से कम की चढ़ाई  करना सरल  होगा । लेकिन हमने जो सच्चाई सीखी है, वह यह है कि हर शिखर और हर अभियान अपनी अपनी अलग चुनौतियों से भरा होता  है।

माउंट एल्ब्रस के लिए पहली चुनौती थी एक उपयुक्त  टूरिंग स्की बूट ’ खोजना जिसे काम्या  शिखर से नीचे स्कीइंग के लिए उपयोग कर सके । हालाँकि, 11 वर्ष के बच्चों के लिए कोई ‘टूरिंग स्की बूट’  नहीं हैं क्योंकि आमतौर पर वे टूर स्कीइंग नहीं करते हैं। साथ ही भाषा भी एक मुद्दा था क्योंकि रूसी गाइड मुख्य रूप से अपनी भाषा में कुशल हैं, इसलिए Google ट्रांसलेट   हमारा तारणहार बना। तीसरी समस्या भोजन की थी। अधिक ऊँचाई पर एक व्यक्ति की भूख मिट जाती है। ऊपर से  हमारे द्वारा भारत में उपयोग किए जाने वाले भोजन की तुलना में वहां भोजन बहुत मसालेदार होता है। इस प्रकार अपने आप का पेट भरना तो कठिन था लेकिन शरीर को पर्याप्त पोषण देना उस से  भी  अधिक आवश्यक और चुनौतिपूर्ण था।

जब हम शिखर पर पहुँचे, तो काम्या को पहाड़ की चोटी पर अपने जूते बदलने पड़े और जो भी वहाँ खड़ा था, वह एक 11 साल की लड़की को जमा देने वाले तापमान में जूते निकालते हुए देख रहा था।

नीचे का मार्ग कुछ बेहतर था लेकिन बहुत जोखिम भरा था। काम्या को एक सुरक्षा रस्सी के साथ गाइड से जोड़ा गया था, ताकि अगर वह फिसल जाए रास्ता भटके  तो उसे दोबारा राह पर लाया जा सके  किया । यह एक विशिष्ट गुण है जो पर्वतारोहण आपको सिखाता है, आपको अपने जीवन के साथ- साथ  किसी और पर भरोसा कैसे किया  जाता है ।

काम्या  एक-दो स्थान पर फिसली लेकिन कुल मिलाकर उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। कैंपसाइट पर पहुंचने पर, हमने बड़ी राहत की सांस ली। हम तीनों ने गौरव के एक पल  साझा किये  क्योंकि हमने सफलतापूर्वक अपने मिशन की दिशा में एक और कदम बढ़ाया था, लेकिन यह भी कि काम्या माउंट एल्ब्रुस के शिखर से नीचे स्की करने के वाली  दुनिया में सबसे कम उम्र की पहली लड़की बन गई।

जब हम शिखर पर पहुँचे, तो काम्या को पहाड़ की चोटी पर अपने जूते बदलने पड़े और जो भी वहाँ खड़ा था, वह एक 11 साल की लड़की को जमा देने वाले तापमान में जूते निकालते हुए देख रहा था।

नीचे का मार्ग कुछ बेहतर था लेकिन बहुत जोखिम भरा था। काम्या को एक सुरक्षा रस्सी के साथ गाइड से जोड़ा गया था, ताकि अगर वह फिसल जाए रास्ता भटके  तो उसे दोबारा राह पर लाया जा सके  किया । यह एक विशिष्ट गुण है जो पर्वतारोहण आपको सिखाता है, आपको अपने जीवन के साथ- साथ  किसी और पर भरोसा कैसे किया  जाता है ।

काम्या  एक-दो स्थान पर फिसली लेकिन कुल मिलाकर उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। कैंपसाइट पर पहुंचने पर, हमने बड़ी राहत की सांस ली। हम तीनों ने गौरव के एक पल  साझा किये  क्योंकि हमने सफलतापूर्वक अपने मिशन की दिशा में एक और कदम बढ़ाया था, लेकिन यह भी कि काम्या माउंट एल्ब्रुस के शिखर से नीचे स्की करने के वाली  दुनिया में सबसे कम उम्र की पहली लड़की बन गई।

माउंट कोसिअसको (ऑस्ट्रेलिया)

माउंट कोसिअसको एक बट्रेक से ज्यादा एक ब्रेक की तरह था |  जिसे आप तब लेते हैं जब आप गंभीर परिस्थितियों  से थक जाते हैं। यह ऊंचाई में बहुत अधिक नहीं है, लेकिन यहाँ जो  तेज़ हवाएँ चलती हैं वो  चिंता का मुख्य  विषय था ।

इस बार काम्या और मैं एक बार फिर पार्टनर थे। जहां से ट्रेक शुरू हुआ था वहां तक ​​पहुंचने के लिए मुझे 230 किलोमीटर की दूरी कार चला कर तय करनी पड़ी। काम्या मेरी नेविगेटर बन गई और हालांकि मैंने अपने आप इतनी लंबी गाड़ी कभी नहीं चलाई थी, 100 किलोमीटर प्रति घंटे की न्यूनतम गति सीमा के साथ एक विदेशी भूमि पर एक फ्री रास्ते पर ड्राइव एक अद्भुत अनुभव और अपने आप में एक रोमांच था।

जिस दिन हमने माउंट कोसिअसकोको पर चढ़ाई की,  हम शिखर पर केवल दो लोग थे, क्योंकि ज्यादातर लोग जो हमारे साथ चढ़े थे, हवा की स्थिति के कारण वापस लौट गए थे। हमने फैसला किया कि , हम पीछे नहीं हटेंगे  क्योंकि हमें फिर से एक और मौका मिलना बहुत मुश्किल था | दूसरी बात यह थी कि मुझे काम्या पर विश्वास था। शिखर पर हमने एक साथ सेल्फी लेने की कोशिश की, लेकिन केवल मेरे फोन को तोड़ने में कामयाब रहे। इसलिए हमने एक-दूसरे के फोटो क्लिक किये।

अब काम्या सात महाद्वीपों में से तीन में सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ने वाली सबसे कम उम्र की पर्वतारोही बन गई थीं। लेकिन अब यह समय था, अगली बड़ी चुनौती की तैयारी का।

माउंट एकोंकागोआ (अर्जेंटीना- दक्षिण अमेरिका)

माउंट Aconcagua (22837ft) काम्या  की अब तक की सबसे कठिनतम  चढ़ाई थी। यह हर क्षेत्र में एक कठिन कार्य था, चाहे वह वित्तीय, भौतिक या भावनात्मक हो। हमें इस कदम के लिए बहुत तैयारी की आवश्यकता थी। इस बार  मेरे पति को काम्या के साथ जाना था, इसलिए उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि वह अपने दम पर काम्या को संभाल सके।

2019 में, इस चढ़ाई की तैयारी के दौरान, काम्या और उसके पिता माउंट मेंटोक कांगड़ी (20554 फीट) पर चढ़े। काम्या  के 3 फीट लंबे बाल हैं जो चढ़ाई करते समय एक चुनौती हो सकते हैं, इसलिए उसके पिता को उसके बालों को संभालना सीखना था ।

(शेष कहानी काम्या  के पिता द्वारा सुनाई गई है)

माउंट एकांकागोआ का ये प्रयास अपने साथ कई चुनौतियाँ लेकर आया। चूंकि यह भू मध्य रेखा के दक्षिण में है, इसलिए वायुमंडलीय दबाव बहुत कम होता  है। साथ ही प्रशांत महासागर के निकटता के प्रभाव के कारण मौसम बहुत तेज़ी से बदलता है । इसके अतिरिक्त, कानूनी तौर पर भी काफ़ी  मुश्किलें थी ।

अर्जेंटीना के लिए उड़ान क़रीब 40 घंटे की थी जिसके बाद हमें  मेंडोज़ा शहर की लिए निकलना था । वहां जाते ही  हमारे वकील ने हमें बताया कि हमें स्थानीय परिवार अदालत से अनुमति लेनी होगी। यह हमारे लिए बहुत चौका देने वाला था| 

स्थानीय अदालत मामले में अपने अधिकार क्षेत्र को लेकर अनिश्चित थी इसलिए उन्होंने केस लेने से इनकार कर दिया। तब हमें एक अर्जेंटीना की उच्च  न्यायपालिका को अपील करनी पड़ी कि वह जूनियर कोर्ट से मामला उठाने का अनुरोध करे। ऊपर से , अदालतें केवल आधे दिन खुल रहीं थीं क्योंकि यह उनकी गर्मियों की छुट्टी का समय था ।

हमने जिस न्यायाधीश का सामना किया, उसने सोचा कि मैं शायद काम्या  को शिखर का प्रयास करने के लिए मजबूर कर रहा हूँ |  इसलिए उसने हमें पहले एक मेडिकल परीक्षण के लिए, फिर एक बाल मनोवैज्ञानिक और उसके बाद एक खेल मेडिकेशन विशेषज्ञ के पास भेजा। अर्जेंटीना की मीडिया ने काम्या की कहानी को कवर करना शुरू कर दिया कि “कैसे एक छोटी सी भारतीय बेटी माउंट एकांकागुआ पर चढ़ने के लिए आई थी और अर्जेंटीना का सिस्टम  उसे इस गौरवशाली अवसर से रोक रहा था ।

दो सप्ताह के संघर्ष  के बाद, न्यायाधीश बदल गए और हमारे सौभाग्य से नए  न्यायाधीश खुद एक पर्वतारोही थे , इसलिए हमें आखिरकार उसी दिन परमिट दिया गया। यद्यपि अब तक हम समय सीमा से बाहर चले गए थे, हमारा वीज़ा समाप्त हो रहा था, नौसेना से मेरा अवकाश समाप्त हो रहा था और  हमारे पास पैसे भी खत्म होने लगे थे| 

ऊपर से , काम्या ने वो सब  देखा जिस से  हमें  गुजरना पड़ा  था क्योंकि मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता था  क्योंकि हम न तो स्थानीय भाषा जानते थे ना  ही वहां के लोगों को ।

जिस टीम के साथ हमने शिखर पर चढने की योजना बनाई थी वह पहले ही चली गई थी और अब मुझे एक नई टीम की व्यवस्था करनी थी। हालांकि जब आप किसी चीज़ को इतनी शिद्दत से चाहते हैं, तो पूरी कायनात आपको उस से मिला  देने की साजिश कर ही  देती  है । हमने अपनी चढ़ाई शुरू की और कैंप 2 की चढ़ाई चुनौती पूर्ण थी लेकिन फिर भी हम  किसी तरह सुरक्षित रूप से वहाँ पहुँचने में सक्षम रहे ।

कैंप-3 के रास्ते में, काम्या को ठंड लगने लगी। जब उसने मुझे बताया, मैंने उसके साथ अपने दस्ताने का आदान-प्रदान किया क्योंकि मेरे पास एक मोटा दस्ताना था। दस्ताने के आदान-प्रदान के बावजूद, खतरनाक हवा की स्थिति के कारण, हमें कुछ समय वहाँ रुकना पड़ा। वह गाइड जो पहले से ही काम्या से आशंकित था उसे एक और कारण मिला और  उसने हमें वापस मुड़ने के लिए कहा। हमने उसे बताया कि सब कुछ ठीक है, लेकिन उसने सुनने से इनकार कर दिया और हमें कैंप 2 में लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा।

कैंप -2 तक पहुँचने के बाद डॉक्टर ने काम्या  की जाँच की, केवल यह पता लगाने के लिए कि वह वास्तव में उस सुबह की तुलना में बेहतर थी कि नहीं  | इसलिए, बेस कैंप टीम एक गाइड के लिए कैंप -2 में आने और अगले दिन हमें वापस ले जाने की व्यवस्था करने जा रही थी। लेकिन फिर हमें पता चला कि हमारे टेंट को पहले ही बेस कैंप में ले जाया जा चुका था, इसलिए हमारे पास बेस कैंप पर एक बार फिर जाने  के अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं था। यह घटना एक झटका थी और मैं भी निराश था, लेकिन काम्या मजबूत बनी रहीं। जब अधिकारियों ने काम्या से  निजी तौर पर बात की, तो उसने अपनी शिखर पर पहुँचने की अपनी इच्छा को  इतनी दृढ़ता और आश्वस्तता से बयान किया की उन्हें एक दूसरे प्रयास के लिए हमें  स्वीकृति देनी ही पड़ी।

जिस टीम के साथ हम कैंप 2 में गए थे, वह शिखर सम्मेलन के बाद वापस आई, और काम्या  से कहा कि “यह बेहतर था कि तुम वापस लौट आए। यह बहुत कठिन था।” एवरेस्ट फतह करने वाले किसी व्यक्ति का यह कहना बेहद  निराशाजनक था।

हालाँकि काम्या अब बहुत अधिक दृढ़ता से आगे बढ़ने लगी | हमें एक नया गाइड दिया गया । हमें जो गाइड मिला, वह 2 साल के अंतराल के बाद समिट कर रहा था क्योंकि पहाड़ पर उसके साथ एक एक दुर्घटना हो चुकी  थी जिस वजह से वह  बिस्तर पर पड़ा था, लेकिन अब यह अवसर उसकी वापसी थी, जिससे उसे अपने नाम पर लगे धब्बे को मिटाना था  और काम्या और मै भी इस बार खुद को साबित करने के दृढ़ संकल्प दिल और  दिमाग़  में कर चुके थे।  

आखिरकार 12 साल की बच्ची के साहस के आगे सभी चुनौतियों को  घुटने टेकने पड़े और हम शिखर तक पहुँच ही गये।

तब तक 2020 का फरवरी आ चूका  था जब Covid19 की स्थिति  ही खराब होने लगी थी। अगर हम एक हफ्ते देरी से पहुँचते, तो शायद हम अपने देश वापस नहीं आ पाते।ऐसा लगा जैसे हमारी किस्मत ने हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचा ही दिया।

ऊँचाइयों की और अगला सफ़र

आज चल रही महामारी की वजह से , मिशन SAHAS  स्थगित  हैं, हालांकि काम्या की  आगे आने वाली चुनौतियों की  ट्रेनिंग अभी भी जारी है। इस बीच, काम्या व्यक्तिगत और ऑनलाइन दोनों में विभिन्न प्लेटफार्मों पर बातचीत और इंटर्व्यू  दे रही है।

वह बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है और हमें उम्मीद है कि वह अधिक से अधिक लोगों को प्रेरित कर सकेगी। हालाँकि अब मिशन SAAS की दिशा में हर कदम के लिए, बढ़ते खर्चों का सामना करने के लिए हमें स्पोंसोर्शिप जुटानी होगी 

काम्या  को अब एक दर्शक वर्ग  मिल गया है |  उसकी उपलब्धियों ने माननीय प्रधान मंत्री जी  की नज़र भी खींची है, जिन्होंने 20 फरवरी को ‘मन की बात’ में काम्या का  उल्लेख भी किया था। हम  2022 तक ‘द एक्सप्लर्स ग्रैंड स्लैम’ को पूरा करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं | 

हमारी और से सभी माता पिता के लिए एक संदेश

हम रिकॉर्ड्स के लिए केंद्रित नहीं थे, हम हमेशा एक अच्छे व्यक्ति ’और एक’ बेहतर नागरिक ’वाली सोच को विकसित  करना  चाहते थे। पर्वतारोहण सिर्फ एक उपकरण था और अन्य उपकरण भी हैं लेकिन  हमारा ध्यान हमेशा समाज के लिए एक अच्छा इंसान बनने पर होना चाहिए ।

काम्या पियानो में 5वाई और गिटार में एक दूसरी  ग्रेड पर है |  उसके पास  एक अच्छा अकादमिक रिकॉर्ड है। वह एक ऑल राउंडर बन गयी है। हमने हमेशा उसे यह सिखाने की कोशिश की कि वह हमेशा अपने समय का सही उपयोग कर सके और अपने जीवन में किसी भी चुनौती का सामना स्वयं कर सके ।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है किआप अपने  बच्चो  को हर वह अवसर दें  जो आप दे सके और उस क्षेत्र में जिसमे वे रुचि रखते  हैं

तो दोस्तों यह थी  माउंटेनियरिंग प्रोडिजीकाम्या की कहानी। उसका ध्यान, दृढ़ संकल्प, रोमांच की इच्छा और रोमांच के लिए प्यार निश्चित रूप से हम सब के दिलों में जोश और जुनून की आग लगा देगा। 

काम्या  और उसका परिवार एक सटीक  उदाहरण है, अच्छा पालनपोषण का। इनके  मातापिता ने अपने बच्चे में साहस की भावना का संचार किया और उसकी  प्रतिभा को नई पहचान दी। वे अपनी बेटी के लिए किसी भी अवसर के लिए सारी हदें पार करने को तैयार है,  जो हम सभी को  सीखना चाहिए|

काम्या के अन्दर की लौ को आपके लिए एक प्रेरणास्त्रोत बनाइए और हर वो एडवेंचर कर आइये जिसके बारे में आपने हमेशा से ख़्वाब देखा लेकिन किसी वजह  से आप उसे पूरा नही कर सके।

लौटेंगे एक और जिद्द से जन्मी कहानी के साथ जो आप में जगा देगी जोश और जुनून | तब तक के लिए 

 Stay Passionate, Stay Stubborn

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