“यस , आई कैन डांस ”- कमलेश पटेल

“यस , आई कैन डांस ”- कमलेश पटेल

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नमस्कार! ज़िद्दी साथियों 

हम एक बार फिर लौट आए  हैं,

ओह रुकिये  !!!!!, आपने यह वाक्य कई बार पढ़ा है। आइए आज एक नए तरीके से फिर शुरुआत करें क्योंकि आज हम जिनकी कहानी आपको सुनाने वाले हैं  उन्होंने नृत्य की दुनिया में अपनी नई  स्टाइल  से नई पहचान बनाई ।

हम बात कर रहे हैं  अपने हाथों पर डांस करने वाले पहले भारतीय डांसर श्री कमलेश पटेल की। 5 साल की उम्र में, एक दुर्घटना के कारण उन्होंने अपने दोनों पैर खो दिए। एक छोटा बच्चा अपनी उम्र के बच्चों को दौड़ता – खेलता  देखता है और खुद खेल नहीं पाता है, आप समझ सकते हैं कि उस पर क्या बीतती होगी।

कमलेश कभी हार मानने को तैयार ही नहीं थे। उन्होंने कभी भी नकारात्मकता को अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया  बल्कि हर बार अपने जीवन में बाधाओं के  घने काले बादलों के बीच भी एक सुनहरी किरण को खोज ही निकाला । आज वह लाखों लोगो के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गए हैं।

उनकी प्रतिभा हीरे से ज्यादा चमकदार  है, उनकी कला पिकासो से ज़्यादा सुन्दर है और उनकी ज़िद एवरेस्ट से ऊँची है ।

आइए भारत के सबसे प्रेरक डांसर्स में से एक, कमलेश पटेल की दास्तां सुनते हैं उन्हीं के शब्दों में ।

अनिश्चित भविष्य के साये में बिता बचपन

मेरा जन्म वडोदरा, गुजरात के पास पादरा नामक छोटे से शहर में हुआ। मैं एक माध्यम वर्गीय परिवार से हूँ । मेरे माता-पिता बहुत प्यार करते और मेरी देखभाल में कोई कमी नहीं रहने देते थे  । ग्रामीण परिदृश्यों में मेरा बचपन बिता , गाँव ने मुझे विनम्रता और पराक्रम दिया, जो आज तक मेरे पास है।

जब मैं 5 साल का था, मुझे एक साधारण बुखार के लिए अस्पताल ले जाया गया था। डॉक्टर ने कहा कि मुझे एक इंजेक्शन की आवश्यकता होगी। किसी को नहीं पता था कि यह बुख़ार ठीक करने वाला इंजेक्शन मुझे हमेशा के लिए अपंग कर, दुनिया ही पलट देने वाला था। डॉक्टर ने मुझे गलत नस में इंजेक्शन लगा दिया ।

मैं अपने पैर नहीं हिला पा रहा था। मेरे माता-पिता मुझे सबसे अच्छे अस्पतालों में ले गए जो भी वे कर सकते थे,उन्होंने किया  लेकिन न तो पैसा  और न ही उस वक़्त की टेक्नोलॉजी मेरे पैरों को वापस देने में सक्षम थी। मुझे अपनी कमर के नीचे से लकवा मार गया था।

मेरे माता-पिता दुखी होते , कि यह उनकी गलती थी। मैं उन्हें प्रेरित करते हुए कहता था “किस्मत को  जो करना था उसने किया ,  अब हमें वह करना चाहिए जो हम कर सकते हैं  ”क्योंकि मेरा मानना ​​है कि किसी के जीवन में जो कुछ भी होता है उसका एक उद्देश्य होता है । हर घटना के पीछे भगवान का लिखा एक कारण होता है।

हमारा समाज विकलांग लोगों को सहानुभूति और निराशा की आंखों से देखता है। मुझे एक हजार बार बताया गया कि “मेरा कोई भविष्य नहीं है।” “मैं अपने जीवन में कुछ नहीं कर सकता।” अब मेरे जीने के दो तरीके थे। एक, तथाकथित समाज द्वारा ध्वस्त हो जाऊँ और हमेशा अपने जीवन से नफरत करता रहूँ  । दूसरा था इसे चुनौती के रूप में लेना और उन्हें गलत साबित करना और उन्हें दिखाना कि एक विकलांग व्यक्ति भी कुछ  कर सकता है।

मैंने चुनौती को चुना, क्योंकि मैं उन्हें दिखाना चाहता था कि मैं विकलांग नहीं हूं, मैं बस अलग तरह से अभिभूत हूं। मेरे द्वारा ली गई हर सांस का एक ही उद्देश्य था, समाज का हमारी ओर देखने का नज़रिया बदलना।

डांस की दहाड़ : इस समाज को मेरा जवाब

समय का पहिया घूमने लगा और मैं  सकारात्मकता की ओर बढ़ने लगा। मैंने अपने जीवन को सकारात्मकता के साथ जीना सीखा। मैंने कभी भी अपनी विकलांगता को अपने जीवन की दिशा को निर्धारित नहीं करने दिया। मैंने हमेशा अपनी कमियों को ताकत में बदलने की कोशिश की।

मैं पढ़ाई में अच्छा था| समाज से मिलने वाले ताने मेरे लिए ईंधन की तरह काम करते । मैं इस प्रेरणा के कारण हमेशा अपना 100% देने में सक्षम रहा। मैं एक प्रशंसनीय ऐकेड़मिक रिकॉर्ड के साथ 9 वीं कक्षा में आया था।

बचपन में मैं टी वी पर आने वाले  डांस शोज़ देखता था और हमेशा डांस करना चाहता था, लेकिन सवाल यह था कि “मैं करूँगा कैसे ?” “क्योंकि डांस एक ऐसी कला है जो दो पैरों वाले लोगों के लिए भी मुश्किल है, तो मैं कैसे कर पाऊँगा। जब मैं थोड़ा बड़ा हो गया, तो मैंने सोचा कि क्या मैं ऐसा करूँ  जो तथाकथित ‘सामान्य’ लोग भी न कर सके , जो समाज के हर सवाल का जवाब दे सके ।

मुझे एक दोस्त से ‘थापा  डांस क्लासेस’ के बारे में पता चला। यह मेरे घर से लगभग 15 किलोमीटर दूर वडोदरा में था। एक दिन मैंने बस अपना तिपहिया साइकिल लिया और पैडल करना शुरू किया और सीधे डांस क्लासेस चला गया।

केवल हाथों से पेडलिंग के साथ 15 किलोमीटर की थका देने वाली यात्रा के बाद, मैं 4 मंज़िलों वाली एक बिल्डिंग के सामने आया। डांस क्लास चौथी मंज़िल पर थीं और इमारत में कोई लिफ्ट नहीं थी। सीढ़ियों पर चढ़ना एक चुनौती थी।मेरे मन में एक ख्याल आया कि  “कभी किसी ने चुनौतियों का सामना किए बिना भला  कुछ हासिल किया है? ”। मैं भी इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो गया| 

मैं किसी तरह ऊपर पहुँचा। थापा सर, जो अकादमी चलाते थे, वे एक असली जौहरी थे। उन्होंने मुझे अभ्यास करने के लिए अपनी कक्षाओं में आने की अनुमति दी और यहां तक ​​कि उन्होंने मुझसे कभी फ़ीस नहीं ली ।

मैं एक बिलकुल नए सफ़र पर निकला। मैं शाम को 5 बजे तक स्कूल में पढ़ता था। फिर 15 किलोमीटर के लिए तिपहिया साइकिल चलाता , फिर 7 – 7:30 बजे क्लासेज पर पहुँचता और  फिर डांस स्टेप्स की  प्रैक्टिस करता | मैं अकेला एक कोने में दूसरों को डांस करता देख कर सीखता था ।उसके बाद  एक बार फिर अपनी तिपहिया साइकिल पर एक लंबी दूरी  तय करके 10 – 10:30 अपने घर पहुँचता ।

मैंने अपने माता-पिता को यह नहीं बताया कि मैं डांस सीख रहा हूं, मैं उन्हें बताता था कि मैं कंप्यूटर क्लास  के लिए जा रहा हूं। दूसरी तरफ डांस अकादमी में , मैं एक कोने में सभी बच्चों को देखता था, मैं ‘एकलव्य ’की तरह  देखकर सीखने लगा  था।

कुछ महीनों तक यही चलता रहा। ऐसे दिन आए जब मेरे हाथों में इतना दर्द होता के मैं कुछ भी करने में सक्षम नहीं होता । मैं खुद से भी सवाल करता था कि “मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ?” फिर समाज के सभी प्रश्न, मुझ पर किये मज़ाक और ‘विकलांग’ का मुझे दिया हुआ  टैग मेरी आंखों के सामने आ जाता । यह  मुझे “मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ ?” का  सटीक जवाब दे दिया करता और मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता |

हम अक्षम नहीं , बस अलग तरह से सक्षम है

मैं मेहनत करता रहा, ताकि मेरी कला दुनिया को वह बता सके जो मैं कहना चाहता था। एक दिन जब मैं अकादमी में अभ्यास कर रहा था, तो एक व्यक्ति अकादमी में आया। वह एक शो के लिए एक डांस ग्रुप चाहता था। उन्होंने मुझे अभ्यास करते देखा और मेरे इंस्ट्रक्टर से मुझे शो में लाने के लिए कहा।

जब सर ने मुझे शो के बारे में बताया, तो मैं उत्साहित था पर  नर्वस भी । मैंने इन महीनों में अपने लिए एक गाने पर कोरियोग्राफी की थी । मेरे पास कोई कोस्टयूम  नहीं थी, इसलिए मैंने किसी तरह अपनी टी-शर्ट को एक फर वाली पोशाक बनाया और शो में एक काली जीन्स पहनी।

जब मैं मंच पर गया, तो लोग चौंक गए लेकिन जब मैंने अपना डांस शुरू किया तो वे आश्चर्य चकित रह गए। सभी ने अपनी सीट छोड़कर मुझे ‘स्टैंडिंग ओवशन’ दिया। मेरी आँखों में आँसू थे, मैंने महसूस किया कि घंटों की मेहनत अब रंग लाने लगी थी।

इस शो के बाद मेरे माता-पिता को भी मेरे डांस  के बारे में पता चला और वे भी खुश थे, क्योंकि उनके बच्चे को सभी के द्वारा सराहा जा रहा था।

अब मुझे एक जुनून  मिल गया था , और अब बारी थी इस जुनून  के पीछे अपने जीवन को न्यौछावर कर देने की|   

मैंने डांस में गहराई से जाना शुरू किया। मैंने बॉलीवुड, जैज़, हिप-हॉप, ब्रेक डांस और कई तरह के डांस  सीखे। फिर मैंने उन्हें अपनी स्टाइल में मिश्रित  किया क्योंकि मैं केवल अपने हाथों से ही डांस कर सकता हूं, इसलिए मुझे ऐसे स्टेप्स  को बनाने  होते है  जो एक ही समय में हाथ और पैर दोनों का मूवमेंट  एक साथ दिखा सकें ।

मैंने डांस में अपनी यात्रा जारी रखी, लोगों ने मुझे अलग अलग शो के लिए आमंत्रित करना शुरू कर दिया, जिसके माध्यम से मैंने अपने ख़र्चों की भरपाई की। मैंने दुनिया को यह दिखाने का हर अवसर लिया कि  हम अक्षम  नहीं हैं, हम बस अलग तरह से सक्षम  हैं। ‘

 

2005 में, ग्रैंडमास्टर सरोज खान वडोदरा में एक प्रतियोगिता में जज के तौर पर आयी थीं । मैं प्रतियोगिता में भाग लेना चाहता था लेकिन जब मैं फॉर्म भरने गया, तो आयोजक ने  मुझे भाग लेने से इनकार  कर दिया। उन्होंने कहा “प्रतियोगिता केवल सामान्य डांसर्स के लिए थी।” इस वाक्य ने मुझे अंदर तक  झकझोर कर रख दिया था की  मै असामान्य कैसे हूँ ?

प्रतियोगिता से ठीक एक दिन पहले, प्रेस कॉन्फ्रेंस में, आयोजकों की टीम के एक लड़के ने सरोज मैम से पूछा कि “क्या उन्हें एक विकलांग डांसर को भाग लेने की अनुमति देनी चाहिए ?” सरोज मैम ने जवाब दिया “यदि उनके पास डांस की  प्रतिभा है, तो उन्हें मौका दिया जाना चाहिए।”

मुझे बताया गया कि मैं प्रतियोगिता में भाग ले सकता हूं। मेरे घर पर एक ‘वॉक मैन’ था, मैंने उस पर गाना बजाया और लगभग पूरी रात अभ्यास किया। अगले दिन, मैं बहुत घबरा गया था। जब मैंने परफॉरमेंस  शुरू की , तो मैं सब कुछ भूल गया और बस उस पल को जीने लगा ।

जब मैंने डांस खत्म किया , तो सरोज मैम अपनी आँखों में आँसू लेकर  खड़ी थीं, और तालियाँ बजा रहीं थी । मानो उनके शब्द कम पड़ गए हों । उन्होंने  मुझे सौ रुपये का नोट दिया, जो मेरे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण स्मृति चिन्हों में से एक बन गया और जब भी मुझे निराशा महसूस होती है, मैं सिर्फ उस नोट पर एक नज़र डालता हूँ  और फिर से अभिभूत हो जाता हूं।

डाँस इंडिया डाँस : ‘तक़दीर की टोपी ’

मैं डांस इंडस्ट्री में आगे  बढ़ता गया। मैंने गुजरात और उसके आसपास के विभिन्न स्थानों पर शो किए। मैं भाग्यशाली रहा कि मुझे अपना खुद का एक दर्शक वर्ग  मिला। मुझे बहूतों ने सराहा। मैं शास्त्रीय और लोक नृत्य की ओर अधिक आकर्षित था |  मेरा मानना था की इन कलाओं  को भी लोकप्रिय बनाया जाना चाहिए । मैं 2009 तक इधर-उधर संघर्ष करता रहा ।

एक दिन मुझे मुंबई में एक दोस्त का फोन आया। उन्होंने कहा “ZEE T.V पर एक शो आ रहा है जिसका नाम DID है। वे गुजरात के प्रोमो शूट के लिए क्लासिकल डांसर्स  चाहते हैं। क्या आप एक डांस ग्रुप की व्यवस्था कर सकते हैं? “

मैं कुछ डांस क्लासेज को जानता था, इसलिए मैंने कहा, “ हां, मैं कर सकता हूं।” जिस दिन अहमदाबाद में डीआईडी ​​ऑडिशन हुए। मैं डांस ग्रुप  लाया, प्रोमो शूट अच्छी तरह से हुआ। शूट  के बाद बच्चों ने मुझसे पूछा “क्या हम भी  ऑडिशन दे सकते हैं।” मैंने मना नहीं किया फिर उनमें से एक ने कहा “सर, आपको भी  ऑडिशन देना चाहिए।” मैंने कहा “नहीं, मेरा सिरोही, राजस्थान में  शो है। मुझे  बस पकड़नी है। ”

फिर मैंने सोचा, कि  मैं कुछ देर बाद वाली बस पकड़ सकता हूँ और यह एक अच्छा अवसर हो सकता है तो  मैं ऑडिशन के लिए गया । मेरे साथ मेरे ‘प्रॉप्स’ (डांसर्स द्वारा इस्तेमाल करने वाली अलग अलग वस्तुएँ )  क्योंकि मैं एक शो के लिए जा रहा था । मैंने ऑडिशन दिया, एक के बाद एक  3 राउंड पार किए।

फिर उन्होंने मुझसे कहा कि कल, एक मेगा ऑडिशन होगा। जिसमें आपको रेमो सर, टेरेंस सर और गीता मां द्वारा जज किया जाएगा। मैं शो के लिए रवाना होना चाहता था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि मैं मेगा ऑडिशन नहीं दूँगा।

डीआईडी ​​टीम ने जोर दिया इसलिए मैंने शो रद्द कर दिया। मैं तीन सेलिब्रिटी जजों के सामने परफॉर्म करने वाला था इसीलिए बहुत नर्वस था, लेकिन मैंने सोचा कि “मुझे डर क्यों लगना चाहिए?” ज़्यादा से ज़्यादा यह  हो सकता है कि मैं चयनित नहीं हूँ ” भला इस से  ज़्यादा और  क्या होगा तो डर किस बात का | 

इसी जुनून के साथ, मैं मंच पर गया। मैंने शानदार  प्रदर्शन किया और जजों से स्टैंडिंग ओवेशन लिया। उन्होंने मुझे मुंबई ऑडिशन के लिए आने का टिकट दिया। मुंबई जाना और भारत के सर्वश्रेष्ठ डांसर्स का सामना करना इतना आसान नहीं था।ये एक नई चुनौती थी।

मुंबई ऑडिशन में, हमें पाँच के समूह में डांस करने के लिए कहा गया । 100 लोग थे और केवल 18 चुने जाने वाले थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं एक ग्रुप में डांस करने के बजाय अकेले डांस करना चाहता हूं, लेकिन मैंने कहा, “मुझे किसी भी तरह के अलग व्यव्हार की कोई ज़रूरत नहीं है , मैं सिर्फ अपनी प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ना  चाहता हूं। अगर मेरे पास प्रतिभा है तो मुझे चुना जाएगा ”

हमें कई स्टाइल्स को एक साथ अपने डांस में लेकर आना था  और बाकि के चार लोगों को डांस करते समय मेरे साथ बराबर में चलना भी था। यह एक चुनौती थी लेकिन हमने इस पर विजय पाई और हम में से 3 का चयन किया गया।

टॉप 18 में आने के बाद, पहला एपिसोड आया और मैंने पहली बार  ‘द डिस्को डांसर ’ मिथुन दा को देखा। मैं पर्फ़ोर्मन्स  करने के लिए मंच पर गया। मेरे पास एक स्पेशल  डांस था जिसमें मैं  डांस करते समय घूमती हुई  थाली को बैलेंस करता था । उस दिन मैंने उसी डांस को दुनिया के सामने पेश किया| 

जब मिथुन दा ने इसे देखा, तो उन्होंने एक ऐसा वाक्य कहा, जिसने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने कहा, “आपका स्तर इस प्रतियोगिता से कई आगे है। आप जज बनने के लायक हैं ”

फिर मुझे एक ग्रैंडमास्टर के रूप में मिथुन दा के बगल में बैठने का मौका दिया गया। मुझे 17 अन्य प्रतियोगियों को जज करने का मौका मिला।

DID के बाद, मेरा जीवन पूरी तरह से फ़्लिप हो गया। शो में “तक़दीर की टोपी” चयनित प्रतियोगियों को दी जाती है। इस  टोपी ने वास्तव  में मेरी तक़दीर को पूरी तरह से बदल गयी। मैं उन 132 देशों में एक जाना माना नाम बन गया जहाँ शो प्रसारित हुआ।

मुझे विदेशी शो के लिए आमंत्रित किया गया था। मुझे हर जगह पहचाना गया। जब मैं त्रिनिदाद और टोबैगो गया तो मैं चौंक गया कि लोगों ने मुझे वहां भी पहचान लिया। वर्षों की मेरी कड़ी मेहनत के फलस्वरूप अब मुझे  प्रसिद्धि मिलनी शुरू हो गई।जहाँ कहीं भी मुझे कोई अवसर मिला मैंने यही संदेश दिया  कि, हमसे विशेष व्यवहार करने की कोई ज़रूरत नही, बस आप हमसे भी उसी तरह से बर्ताव करें जैसा के आप किसी भी आम इन्सान के साथ करते है 

2011 में, मुझे सरोज खान मैम के साथ “गुजरात डांस चैंपियनशिप” नामक एक डांस प्रतियोगिता में जज करने का मौका दिया गया। जब हम मंच पर मिले, मैंने उनके पैर छुए और उनसे पूछा कि क्या उन्हें  मैं  याद हूँ या नहीं । उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने डीआईडी ​​में मेरा प्रदर्शन देखा।

और सोने पर सुहागा यह हुआ  कि जिन प्रतियोगियों को हमने जज किया, वे कोई और नहीं वे ही थे  जिन्होंने कुछ साल पहले मुझे प्रतियोगिता में भाग लेने से मना किया था।

इससे मुझे एहसास हुआ कि, हां मैं बहुत प्रगति कर चुका हूँ  लेकिन अभी भी बहुत कुछ बचा है।

मेरी कला, मेरी पहचान

डी आई डी ​​के मंच ने मुझे बहूत बड़ी पहचान मिली लेकिन मैंने इसे कभी सर पर नहीं चढ़ाया  दिया। मैं इसे एक ज़िम्मेदारी के रूप में लेता हूं कि अब लाखों लोग मुझे देख रहे हैं और मुझे उनके लिए एक अच्छा उदाहरण पेश करना है।

मैं कभी शादी नहीं करना चाहता था क्योंकि मेरे  साथ मुझे खुद को कई सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है और जो मुझसे शादी करती है उसे भी भुगतना होगा। मैं किसी भी लड़की के जीवन को बर्बाद नहीं करना चाहता था। 2010 में, मैं एक ऐसी लड़की से मिला, जिसने मेरी हर कमी को स्वीकार किया और मैं जैसा हूँ उसी  रूप में मुझे अपनाया।

उसने मुझे विश्वास दिलाया कि मैं एक अच्छा जीवन साथी भी बन सकता हूँ। मुझसे शादी करने के लिए उसे अपने परिवार के खिलाफ जाना  पड़ा। वह इतनी मजबूत महिला है कि अपने परिवार का सामना करने के बाद भी वह मेरे साथ मज़बूती से खड़ी रही।

आखिरकार हमने शादी कर ली और आज हमारी  एक प्यारी सी बेटी । उसने हमारे जीवनरूपी सफ़र को नया मोड़ दिया  और एक पिता के रूप में ये सफ़र बेहद  ख़ूबसूरत रहा ।

मैं 2009 से लगातार शोज़ कर रहा हूं। हर दिन मैं कुछ नया सीखने और दर्शकों के सामने पेश करने की कोशिश करता हूं। इसके अलावा मैंने अपने गाँव में एक अकेदमी खोली ताकि मेरे जैसे बच्चों को उनके घर के करीब ही सर्वश्रेष्ठ डांस ट्रेनिंग मिल सके।

मैंने यह भी देखा है कि कई ‘डिफरेंटली अबल्ड’  डांसर और अन्य कलाकार आगे आए हैं। जब भी मैं उनसे मिलता हूं और वे मुझे बताते हैं कि मैं उनके के लिए एक प्रेरणा था तो  मुझे लगता है कि पृथ्वी पर आने का मेरा उद्देश्य कुछ हद तक पूरा हुआ है।

आप कह सकते हैं की एक बच्चा जिसे समाज ने हमेशा कहा की उसका कोई भविष्य नहीं है आज एक नया मुक़ाम  हासिल कर चूका है और वो अब कभी रुकने वाला नहीं है

मेरे अगले कदम

मैंने अपने जीवन को एक यात्रा बना लिया है, मेरे जैसे लोगों को प्रेरित करने की यात्रा । हमारे प्रति समाज के दृष्टिकोण को बदलने के लिए,  मेरा अगला कदम, एक फिल्म है। मैं चाहता हूं कि मेरी यात्रा पर एक फिल्म बने जिसका टाइटल होगा “यस ! आई कैन डांस ”

इसके अलावा मैंने  ‘कमलेश पटेल हेल्थ केयर फाउंडेशन’ के नाम से एक  NGO भी  स्थापित किया है जो जरूरतमंदों के लिए काम करता है। हम निमित बनने की कोशिश करते हैं। ’हमें मिलने वाले दान के माध्यम से, हमने उन लोगों की मदद करने की कोशिश की है जो कोरोना की स्थिति से प्रभावित थे, विशेषकर जो मनोरंजन के क्षेत्र में हैं।

मैं तो सिर्फ इतना कहूँगा के “जीवन की असली उड़ान अभी बाकी है , अभी तो नापी है मुट्ठी भर ज़मीं हमने ; अभी तो पूरा आसमान बाकी है ”

मेरा संदेश

मैं हमारे देश के युवाओं से बस यही चाहता हूं कि छोटीछोटी समस्याओं पर अपनी सारी उम्मीदें खोएं, ऐसे लोगों को देखें जो अपनी कमज़ोरियों के साथ जी रहे हैं और उन्हें ताकत में बदल रहे हैं

बस मेहनत करते रहिये, आपकी प्रतिभा बहती नदी की तरह है, आपको सफलता के प्रवाह  से कोई नहीं रोक सकता।

तो दोस्तों यह थी अपने हाथों पर डांस करने वाले पहले  भारतीय डांसर की प्रेरक कहानी। उनकी यात्रा ने ना  केवल उनके जैसे बल्कि हर  तरह के  अन्य लोगों को भी अपने जीवन में सफल बनने  के लिए प्रेरित किया है।

हमें अपने जीवन में हर पल उनके द्वारा दिया गए संदेश को याद रखना चाहिए कि

 “मंजिल उन्हीं  को मिलती है, जिनके सपनों  में जान होती है!!

पंख से कुछ नहीं होता दोस्तों , हौसलों से उड़ान होती है!!। “

हम  लौटेंगे अगले हफ्ते  एक और ज़िद से जन्मी दास्तान के साथ, तब तक के लिए 

Stay passionate, Stay Stubborn 

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