किस्मत की  दीवारों को बिखेरती मेहनत की दास्तान : पूजा बिश्नोई

किस्मत की दीवारों को बिखेरती मेहनत की दास्तान : पूजा बिश्नोई

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ज़िद  और साहस  की कहानियों की खोज मे हमारा सफ़र आज हमें ले आया है, भारत की उस बेटी की कहानी पर जिसकी मेहनत और लगन ने सारी दुनिया को चौंका दिया | 9 साल की कच्ची उम्र इन्होने अपनी बॉडी को इस तरह तैयार  किया है की इनके आगे बड़े बड़े सूरमा भी फीके लगते है|

पूजा के सिर  पर आज देश के सबसे बड़े स्पोर्ट्स फ़ाउंडेशन ‘विराट कोहली फ़ाउंडेशन ’ का हाथ है पर यहाँ तक का सफ़र किसी जंग से कम नही रहा| जोधपुर के पास के एक छोटे से गाँव गुड़ा बिश्नोईन के एक आम किसान के घर जन्मी इस बच्ची  की कहानी आज आपसे साझा करेंगे उनके कोच और उनके मामा श्रवण  बुड़िया|

श्रवण खुद एक सफल धावक रहे है| शारीरिक दिक्कतों ने श्रवण से उनका मैदान छीना तो इन्होने 3 साल की नन्ही सी उम्र से ही पूजा को ट्रेनिंग देना  शुरू कर दिया| हर मुश्किल, हर कठिन घड़ी में पूजा के साथ खड़े रहे  और उसे आज इस काबिल बनाया की वो देश के लिए ओलंपिक गोल्ड मेडल लाने का सपना, हक़ीक़त  में  तब्दील करने के  बेहद क़रीब  पहूँच  चुकी  है|

आइ ये हमारे साथ, और जानिए पूजा की कामयाबियों के पीछे छिपी  अटूट मेहनत की अनकही दास्तान| पूजा के जीवन की यहाँ तक की दौड़ का आज हम भी एक हिस्सा बनेंगे, महसूस करेंगे उसके दर्द और अथक  परिश्रम और प्रयासों को, क्योंकि हमारा लक्ष्य है  ज़िद से निकली ऐसी कहानियों को आपके सामने लाना जो आप में  जगा दे जोश और  जुनून ।

एक एथलीट से कोच तक का सफ़र

मेरा जन्म  गुड़ा बिश्नोईन मे हुआ |  मेरे पिता एक किसान है | ज्यादातर जीवन गाँव मे बिताने की वजह से मै  अपने देश की मिट्टी से जुड़ा रहा हूँ | बचपन से मेरा रुझान पढाई के बज़ाय  खेलों  मे ज्यादा था | हर भारतीय लड़के की तरह मेरी भी आँखों मे कभी इंडिया की क्रिकेट जर्सी पहनने का सपना था |

क्रिकेट खेलते खेलते मैने महसूस किया मेरी दौड़ने की क्षमता भी अच्छी है |  बिना किसी कोच या संसाधन के मेहनत  करता रहा और धीरे धीरे ,मैं अपने शहर के नामी धावकों  मे शामिल हो गया  | मेरे पास  कोई संसाधन तो नही थे पर मेरे पास थी एक  ज़िद  थी  कुछ कर दिखाने की |

कहते है  कोशिश करने  वालों  की  हार  नहीं  होती,  ऊपर वाले ने भी मेरा साथ दिया और  मैंने अपनी मेहनत के दम पर Sports Authority of India (SAI) मे  सेलेक्शन पाया | SAI के साथ मैंने 3 साल ट्रेनिंग की  | इस दौरान मे भारत भर के बड़े बड़े कोच  से मिला उनके  साथ मे मुझे  सीखने का मौका मिला, कहीं  ना  कहीं  कोच बनने के बीज इसी समय पनप  गए थे |

मैंने इन तीन सालो मे जी तोड़ मेहनत की और एथलेटिक्स की छोटी से छोटी  बारीकियों को समझा | हर दिन मैंने अपने आप को आगे बढते पाया | मेरा सपना था  देश के ओलंपिक मे गोल्ड मेडल जीतना  और मैंने इस सपने को पाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की |

पर कुछ चीज़ें हमारे  कर्म  तो  कुछ  क़िस्मत  तय  करती है / इतनी जी तोड़ मेहनत करने के बावजूद मुझे  रनिंग ट्रैक छोड़ना पड़ा | मेरे ‘Hamstring’ मे लगी चोट ने मुझसे मेरा खेल का मैदान ज़रूर छीन  लिया था लेकिन मेरा जज़्बा नहीं  ।भला  कौन जानता था की ऊपर वाले ने मेरी किस्मत मे कुछ और ही लिखा था |

 

अपने घर लौटने के बाद मैं मजबूर था खुद को पढाई की और मोड़ने के लिए क्योंकि खेल का मैदान मुझे  ठुकरा चुका था पर एक खिलाडी के लिए अपने खेल को छोड़कर किसी और दिशा मे अपना ध्यान लगाना बेहद  मुश्किल होता है  | इस बात का एहसास मुझे बहूत छोटी उम्र मे ही हो गया |

2011 में   हमारे  परिवार  मे  एक नन्ही परी का आग मन हुआ, जिसकी किलकारियों ने  हमारे आँगन मे एक बार फिर ख़ुशियाँ चहक उठी थी  | वो परी थी  पूजा  |  पूजा एक नन्ही परी की तरह मेरी दीदी की गोद मे आई |

मै  हमेशा देखा करता था  की कोई भी एथेलेटिक इवेंट हो चीन हमेशा ही टॉप पर आया करता था | जब मैंने ‘Youtube’ और कई अन्य प्लेटफ़ोर्म  पर वीडियो देखना शुरू किया ।रिचर्स से मुझे पता  चला  की चीन मे खिलाड़ियों की ट्रेनिंग एक   छोटी सी उम्र से शुरू कर  दी जाती है जिसके रहते उन्हें अपने आगे के करियर मे दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता छोटी उमर में ही उनकी अदम्य प्रेक्टिस की नीव रख दी जाती है।

जब पूजा तीन साल की हुई तो मैंने ऐसे ही एक दिन उसे हमारे खेत पर आये दूसरे बच्चों के साथ  दौड़लगवायी  | पूजा उस दिन भी पूरी लगन से दौड़ी लेकिन अपने से उम्र मे दोगुनी लड़कियों  और लड़को से भला  कोई  भी  लड़की  कैसे  मुक़ाबला कर  पाती? मैंने उन सभी बच्चों से कहा  “तीन महीने है तुम्हारे पास, तीन महीने बाद पूजा तुम सबको यही हराएगी | ”  

मैंने पूजा मे लगन देखी और मुझे लगा हौसला तो  बुलंद  है  बस मार्गदर्शन की ज़रूरत  है। बस फिर क्या, पूजा की ट्रेनिंग देने  की ठान  लेने के साथ ही एक कोच के तौर पर मेरा सफ़र शुरू हुआ |

On Your Marks

अगले तीन महीने पूजा ने मेरे साथ मिलकर इतनी मेहनत की, की कई बार तो मै  खुद ही अचम्भित हो  जाता था ।  एक तीन साल की बच्ची  ने जब गुडिया से खेलने के बजाय दौड़ के मैदान मे इस तरह ख़तरनाक तरीक़े से खेलना शुरू किया   तोमेरा  भी खून खौल  उठा  अपना  अधूरा सपना पूरा  करने को।फिर तो  मेने भी ठान ही लिया, की मैं अपनी और से कभी  कोई कमी नहीं आने दूँगा |

मैंने पूजा को ट्रेनिंग देते  वक़्त कभी ये नही सोचा की मैं एक लड़की को ट्रेन कर रहा हूँ, मैंने हमेशा उससे उतनी ही कड़ी ट्रेनिंग दी जितनी मिया किसी द्लाद्के को देता|

 हमारे देश मे हम लड़कियों को हमेशा से ही  सिखा देते है की लड़के उनसे ज्यादा ताक़तवर है या उन मे ज्यादा शारीरिक क्षमता है । बचपन से ही हम हाथी  के  पैर  में  ज़ंजीर  बांध  कर उसे  यह  अहसास  करवा  देते है  की  हाथी जैसा बलवान  प्राणी  बड़ा  होने  पर  भी  ज़ंजीर  को  खुद से  ज़्यादा ताकतवर  समझना   शुरू कर देता है। वैसे ही  हम हीनता की एक  ज़ंजीर लड़की की क़ाबिलियत पर  भी  बाँध देते है जिसकी  वजह से वो  खुद को कम आंकना शुरू कर  देती है| लेकिन मैंने पूजा को कभी यह नही सोचने दिया और बल्कि मैंने उससे हमेशा यही सिखाया की इतनी मेहनत  करें की वह लडको को भी उतनी ही आसानी से हराया जा सकत  है  जितनी आसानी से वह लड़कियों को हराती  है|

तीन महीने की कड़ी मेहनत  के बाद जब वो दिन आय तो पूजा ने अपने से कई उम्र और लम्बाई मे दोगुने लड़को  और लड़कियों को भी हरा दिया| इस छोटी सी जीत ने पूजा को इतना प्रतिस्पर्धात्मक बना दिया  की अब उससे मेरे प्रोत्साहन की भी जरुरत नही थी| अब वो खुद मेरे पास आकर उससे ट्रेनिंग देने को कहने लगी|

 रोज़ाना 3बजे  उठकर हम लोगो ने ट्रेनिंग करना शुरू किया  और मे पूजा को हर वो मुश्किल से मुश्किल एक्सरसाइज करवाता जो उसके उम्र के बच्चे करना तो  दूर सोच भी नही सकते थे| उसके माता पिता ने भी उसे बहूत हौंसला आफ़जाही  ककी  और मै उनका शुक्र गुजार हूँ  की उन्होंने कभी भी  हमें कभी रोका नहीं, गाँव मे रहने के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी को कभी चुल्हे चौके तक अपनी सोच सीमित नहीं  रखी जैसा कि आज  भी  अधिकांशतः लड़कियों के  अबिभावक करते है ।

अब हमारे आगे एक ऐसी मुश्किल आई जो शायद हर उस व्यक्ति के आगे आती है जो एक ग़रीब घर से निकल कर भी अपने पहाड़ जैसे विशाल सपनों को पूरा करने की ठानलेता है; पैसों की दिक्कत|  एक एथलीट के लिए टैनिंग के साथ साथ एक मुनासिफ डाइट सबसे ज़्यादा होती है| अगर आप डाइट नहीं मेन्टेन कर रहे है तो चाहे आप कितनी ही मेहनत  कर ले आपका शरीर उस ट्रेनिंग को झेलही  नहीं सकता|  पूजा के लिए डाइट जैसी चीज़े लाना मेरे लिए भी मुश्किल था क्योंकि मेरा आमदनी का  कोई साधन नही था|

 मैंने  मेरे गाँव मे ही एक दुकान पर दिन में  काम करने का फैसला किया ताकि मै उस पैसे से पूजा के  लिए वो चीज़े खरीद सकूँ जिसकी उसकी बोड़ी को  ट्रेनिंग के  लिए  जरुरत है| जितनी मेहनत मै  करता उससे कही ज्यादामेहनत  पूजा करनेलगीथी।

ग्राउंड से बाहर जहाँ  हम मामा-भांजी की एक शैतान जोड़ी थी वाही ग्राउंड पर आते ही वो एक खिलाडी और मैं एक कोच| मैंने उससे हमेशा ग्राउंड पर पूरी तरह से फोचुस्सेद रहना ही सिखाया और  छोटी उम्र से ही पूजा भी इस बात को भली भाँति समझ गयीथी | मेरा हमेशा से मानना है की एक खिलाड़ी के लिए उसके खेल के मैदान से बड़ा कोई मंदिर नहीं होता|

पूजा ने  अब अलग अलग प्रतियोगिताओं  मे हिस्सा लेना भी शुरू किया| वो कभी खुद को लडको से कम नही आंकती थी, हमेशा उन्हें हराने की सोच को लेकर ही आगे बढती थी| पूजा जहाँ भी जाती या तो जीत कर आती या सीख कर आती, हारना तो उसने सिखा ही नहीं|

 जब पूजा पांच साल की हुई तो हमारे मैदान पर अब एक नए खिलाड़ी ने कदम रखा जो था उस का छोटा भाई कुलदीप| कुलदीप ने भी 3 साल की उम्र में ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया | इन दोनों बच्चों में वो क्षमता है की ये सीमित संसाधनों में भी  निरंतर मेहनत करते रहे है और आगे भी  हमेशा  करते रहेंगे|

Get Set

पूजा और कुलदीप दोनों ही असीम  लगन के साथ ट्रेनिंग करते|  हम सुबह 3 बजे से लेकर 7 बजे तक मेहनत करते और फिर वो दोनों स्कूल के लिए चले जाते| 7 बजे से लेकर दोपहर 2 बजे तक ये पढाई करते| लौटने के बाद दिन में 4 बजे से लेकर हम दोबारा ट्रेनिंग शुरू करते और शाम 7 बजने तक रुकने या थकने का कोई नाम नही लेता |

 इन  दोनों के ज़रिये मुझे अपने सपने को दोबारा जीने का मौका मिला |  अब मेरी आँखों में  पूजा को देश के  लिए ओलंपिक मेडल जीतते देखने का सपना सजने लगा| इसी  दौरान मैंने पूजा के  एक्सरसाइज वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर करना शुरू किया|

 मै पूजा के उन एक्सरसाइजेज के वीडियो और फोटो पोस्ट करता जो देखकर एक बार के लिए किसी को भी देखकर आश्चर्य  हो की एक 5 साल की छोटी सी बच्ची ये सब कैसे कर लेती है|  फेसबुक और इंस्टाग्राम  पर हमारा ये नया सफ़र और  शुरू हो गया|  

 दूसरी और पूजा और कुलदीप दोनों ही प्रतियोगिताओं में जीतने  लगे औरधीरे धीरे  हम लोगो की नजर में आने लगे| पूजा धीरे धीरे स्टेट लेवल की प्रतियोगिताओं  तक पहुँच गयी और वहां भी उसका कोई कंपीटिटर  नहीं था| उसके ‘ऐज ग्रुप’ में पूजा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करती|

 पूजा ने 6 साल की उम्र में नेशनल प्रतियोगिताओं में भी भाग लेना शुरू किया और एक के बाद एक पदक हासिल किये| उसने रिकार्ड तोड़ना शुरू कर दिया था|हमारी तीन साल की मेहनत अबजाकर  रंग ला रही थी|

 मैंने ‘जोधपुर मैराथन’ के लिए पूजा को तैयार करना शुरू किया | पूजा की ट्रेनिंग को अब एक नयी ऊंचाई पर ले जाने का समय आगया था | पूजा के स्टैमिना और स्पीड दोनों को ही हमने कड़ी मेहनत से सींचा| एथलीट के लिए शारीरिक क्षमता के साथ साथ मनोबल भी बेहद  जरूरी है  इसलिए मैं पूजा को खेल खेल में  इस तरह तैयार करता की जोधपुर मैराथन का खिताब भी उससे आसान लगने लगे|

 जब जोधपुर मैराथन का दिन आया तो पूजा पूरी तरह तैयार थी अपने आगे आने वाली हर मुश्किल का सामना करने के लिए| पूजा ने जब दौड़ना शुरू किया तो मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी|  कोच होने के साथ साथ मै  उसका मामा भी हूँ और उससे हारते हुए देखना मुझे भी रुला देता लेकिन पूजा ने जब रफ़्तार पकड़ी तो फिर वो किसी के हाथ न आयी| 

 उसने 7 साल की उम्र में 10 किमी की रेस  सिर्फ 48  मिनट में खत्म कर इतिहास रचा | पूजा का यह कारनामा एक Asia Record बना और इसी के साथ पूजा 7 साल की उम्र में रिकॉर्ड होल्डर भी बन गयी| हमारी ख़ुशी का कोई ठिकाना नही था लेकिन हमारी सोच यही थी की हमें इससे भी बेहतर करना है|

 इसके बाद हमारा रूटीन और सख्त हो गया क्योंकि मेरा मानना है की हमें अगर सफल होना है तो हर दिन खुद से बेहतर बन ने का लक्ष्य रखना चाहिए , कोई ये  ना  कहे  की  पहली  सफलता  तो  तुक्का  या क़िस्मत की  बात  थी, पूजा के भी आगे बढ़ने के लिए हमारा लक्ष्य उससे खुद से ही बेहतर बनाना रहता है|

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एशिया रिकॉर्ड होल्डर बनने के बाद हमने अगला लक्ष्य सीधा  वर्ल्ड रिकॉर्ड की और| सर्दी, गर्मी, बरसात चाहे जो भी आया हमने एक दिन भी ट्रैक नही छोड़ा और पूजा ने भी कभी इसे लेकर शिकायत नहीं की| पूजा की  ट्रेनिंग और मेहनत में भी अब एक क्लास आ चुकी थी क्योंकि उससे भी एहसास था की अब उसकी  प्रतिस्पर्धा खुद से ही है|

 एक Asian रिकॉर्ड बनाने के कुछ ही महीनों बाद ही पूजा ने अगला बड़ा कारनामा कर दिखाया| पूजा ने एक नेशनल लेवल एथेलेटिक इवेंट में 3 किमी की दौड़ को 12 मिनट 30 सेकंड में पूरा किया और बन गयी ऐसा करने वाली दुनिया की पहली ‘Under 10 ’  फ़ीमेल एथलीट बनी|

 दूसरी और पूजा के वीडियो सोशल मीडिया पर भी धूम मचाने लगे और मैंने भी धीरे धीरे सोशल मीडिया उपयोग   सीखना शुरू किया| मैं विराट कोहली सर का डाई हार्ड फेन रहा हूँ, तो मैंने उन्हें और उनके मैनेजर्स को भी टैग करना शुरू किया| इन वीडियो की वजह से हम कई बड़े सितारों की नज़र में  भी आने लगे और धीरे धीरे पूजा एक ‘Internet Sensation’ बन गयी|

 इन्स्ताग्राम के कारण हम विराट कोहली फ़ॉउन्डेशन  की नज़र में आयी  और धीरे धीरे मेरी विराट सर के मनाजेर्स से बात होने लगी| वो पूजा को लेकर काफी आश्चर्य चकित हुए  और होते भी क्यों न पूजा ने ऐसा हैरान करने वाले कई कारनामे कर दिखाए थे|

 2019 में पूजा का सिलेक्शन Virat Kohli Foundation के द्वारा किया गया| ये वो क्षण था पूजा की माँ मीमा और उसके पिता अशोक की आँखों में  मैंने ख़ुशी के आँसू देखे| जब स्कालरशिप के लिए हमें मुंबई बुलाया गया|

इस शान में मुझे हर वो मुश्किल  लम्हा याद आया जो पूजा ने और मैंने ट्रैक पर बिताया था, हर वो चोट जो पूजा को आई, मेरी आँखों के सामने थी| मैं उसका कोच होने के नाते उसके साथ मुंबई आया|

 जब बड़े बड़े खिलाड़ियों के बीच पूजा का नाम लिया गया तो मेरा दिल सहम सा गया और जब पूजा स्टेज पर गयी और विराट कोहली और अमिताभ बच्चन सर के बीच खड़ी हुई तो मेरे धैर्य ने भी मेरा साथ छोड़ दिया और मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े | मैं खुश था की पूजा ने आज इतना कुछ पा लिया की वो सदी के महानतम भारतीयों के बीच खड़ी थी|

 Virat Kohli Foundation से जुड़ने  के बाद, पूजा को हर वो सप्लीमेंट, ट्रेनिंग इक्यूपमेंट  मिला जो उसके लिए जरूरी था| इसी  की बदौलत पूजा ने 8  साल की उम्र में ‘Six Pack Abs’ बना लिए और ऐसा करने वाली सबसे छोटी एशियन फ़ीमेल बनी|

 Virat Kohli Foundation में सबसे छोटी एथलीट होने के नाते अब वो सभी से सीखने भी लगी और भी  आगे बढ़ने लगी| अब मेरे कंधे पर भी एक नयी ज़िम्मेदारी है जो की देश की ज़िम्मेदारी है| पूजा इस देश की धरोहर है उससे बेहतर बनाना इस देश का कार्य है और मुझे गर्व है की मैं ये कर पा रहा हूँ|  

लक्ष्य दुनिया पर फ़तह का

पूजा और मेरी आँखों में अब एक ही सपना है जो हम सोते हुए हुए नहीं हर रोज़ ट्रैक पर मेहनत  करते हुए देखते है 2024 में  यूथ ओलंपिक खेलो में देश के लिए मेडल जीतना| हम इस लक्ष्य को लिए हर रोज़ मेहनत करते है| आप के मन में  ये सवाल तो होगा की मै  आश्वस्त कैसे हूँ  की

पूजा हमारे देश के लिए मेडल लेकर ही आएगी तो इसका जवाब है की पूजा अभी 12 मिनट में 3 किमी दौड़ रही है और ग़ौरतलब है की 9 मिनट में 3 किमी ओलंपिक यूथ खेलो में  वर्ल्ड रिकॉर्ड है|

 हम हमारे लक्ष्य से इन्ही तीन मिनट की दुरी पर है और इसके लिए हम घंटो मेहनत करते है हर रोज़| अभी भी जब कोरोना जैसी महामारी ने हमें घेरा हुआ है, तब  भी  हम रुके नहीं| हमारे खेत पर हमने एक ट्रैक बना लिया है और पूजा और कुलदीप उस अब दोगुनी जान लगाकर दौड़ते है, हमारी ट्रेनिंग हर दिन और कड़ी और अनुशासित होती जा रही है|

 हम न अब तक रुके और ना आगे भी कही रुकने वाले है|

एक सन्देश हर माता पिता के नाम

 पूजा को तीन साल की उम्र से ट्रेनिंग देते हुए  मैंने सीखा की कितना कुछ है जो हम हमारे बच्चों  के दिमाग में  भर देते है जो शायद सत्य भी नहीं| ट्रैक पर मेहनत करते करते पूजा लड़को को खुद से बेहतर मानने के बजाये अपना कम्पटीशन समझने लगी|

 ऐसे ही अगर हम हर लड़की की दिमाग में यह हीनता की  ज़ंजीर  डालना बंद कर दे के वो लड़को से  कमज़ोर है तो देखिय्गा कैसे हमारा देश दुनिया को पीछे छोड़ता है | हमारी बेटियां किसी सूरत में  किसी से कम नही है, ये बात जितनी जल्दी हम गाँठ बाँध ले उतनी जल्दी ये देश तरक्की करेगा| फिर हम सच में गर्व के साथ कह सकेंगे ‘मेरा देश बदल रहा है आगे बढ रहा है’।

 और  एक छोटी सी बात कहना चाहता  हूँ की अगर आपका बच्चा  खेल में अच्छा  है तो उसे  खेलने दीजिये, क्योंकि पूजा जैसे कई खिलाड़ियों  ने यह  साबित किया है की “पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे ,कूदोगे तो बनोगे  ख़राब ” महज़ एक झूठ है |

 मैं कहना चाहता हूँ की “ खेलोगे , पढोगे  चाहे जो भी करोगे , अगर मेहनत करोगे तो  रचोगे इतिहास” 

तो हमारे जिद्दी साथियों ये थी कहानी उस सोन चिडियाँ  की जिसने ना केवल अपने परिवार , अपने गाँव का नाम बल्कि दुनिया भर में हमारे देश का नाम भी अपनी  क़ाबिलियत और  मेहनत के  बल पर रोशन किया | पूजा और श्रवण “जहाँ चाह वहां राह ” का जीता जागता उदाहरण है | संसाधन , पैसा सब को फीका करता इनका ज़ज़्बा ही तो  है जिसने आज पूजा को इनख़्वाहिशों के ऊँचे  आसमान की  भी  सैर करा डाली।

 हमें भी इनके इस जज़्बे से सीख कर अपने जीवन में वो आग प्रज्वलित करनी चाहिए जो हमें जीवन भर कठिन परिश्रम करने की उर्जा दे |  किस्मत सिर्फ आपको मौका देती है लेकिन आपकी मेहनत दुनियाँ को चौंका देती है |

 इसी के साथ आपसे विदा लेंगे और मिलेंगे अगली बार एक नहीं  ज़िद   की नयी दास्तान के साथ तब तक के लिए

 Stay passionate, Stay Stubborn

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